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BOTH/AND THINKING

Both/And Thinking

Wendy K. Smith, Marianne W. Lewis

तनाव करे राहें आसान

डिसीजन मेकिंग एक मुश्किल काम है। बड़े से बडे और अनुभवी लोग भी इसे चैलेंज की तरह समझते हैं। लेकिन साल 2022 में आई ये किताब आपको इसके लिए एक नई रूप रेखा देती है। आमतौर पर किसी फैसले के दौरान either/or वाली अप्रोच पर फोकस किया जाता है लेकिन ऐसे में या तो कोई ना कोई sacrifice करना पडता है या फिर किसी गलती की गुंजाइश बनी रहती है। लेकिन both/and वाली अप्रोच से हर मुश्किल फैसला आसान बनाया जा सकता है।

लेखक

Wendy Smith, Delaware यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट पढाते हैं। Marianne Lewis, Cincinnati यूनिवर्सिटी के Lindner School of Business में डीन हैं। ये दोनों paradox study के एक्सपर्ट्स में से एक हैं और इन्होंने ब्रांड, कॉर्पोरेशन और सरकारों के इस रवैये पर बहुत स्टडी की है। इस किताब में ये आपको भी किसी paradoxical situations से आसानी से निकलने का तरीका समझाते हैं।

 

BOTH/AND THINKING
BOTH/AND THINKING

 

आसान तरीकों की मदद से both/and माइंडसेट अपनाइए

 

किस चीज का ज्यादा महत्व है कामयाबी या निजी जिंदगी? अपनी खुशी या समाज की तरक्की ? आधुनिक जिंदगी ऐसे ही चुनाव हमारे सामने रख देती है। ऐसे में हमारा दिमाग either/or वाली सोच पर चलने लगता है। हमें बस ये समझ आता है कि अगर एक चीज को चुनना है तो दूसरे को छोडना ही होगा। यानि त्याग करना जरूरी है। लेकिन हम ऐसी उलझन में गहराई से उतरकर और इससे जुडे paradoxes को समझकर एक ऐसा हल ढूंढ सकते हैं जहां हमारे पास win win वाली सिचुएशन हो। अंग्रेजी में एक कहावत है Have your cake and eat it too पर ये तो पैराडॉक्स हो गया। अगर केक खा लिया तो हाथ में क्या बचेगा? हमने अभी तक पैराडॉक्स शब्द बहुत बार सुन लिया। पर ये है क्या और हमारे सामने आता क्यों है? अगर किताबी परिभाषा के हिसाब से समझें तो पैराडॉक्स एक self contradictory बात है। आसान शब्दों में बोला जाए तो कुछ ऐसा जो अपने मतलब से बिल्कुल उल्टा या अलग नजर आता हो। इस उदाहरण से आपको बात अच्छी तरह समझ आ जाएगी जब हम कहेंगे more is less या फिर save money by spending it. पैराडॉक्स आपको जिंदगी के हर मोड पर मिल सकता है। ये तब आता है जब किसी सिचुएशन के अलग अलग हिस्से एक दूसरे के सामने खडे हो जाएं और इनमें आपस में टकराव हो, तनाव हो। हालांकि इस किताब की मानें तो ये तनाव बहुत प्रोडक्टिव साबित हो सकता है और आपके काम को भी बेहतर बना सकता है।

चलिए इसे दो तरह से समझा जाए। खच्चरों का तरीका और tightrope walker का तरीका। खच्चरों को घोडे और गधे के मेल से बनाया गया है। इनमें घोड़ों से ज्यादा ठहराव और गधों से ज्यादा दिमाग होता है। यानि दोनों का बेहतरीन वर्जन। अब both/and माइंडसेट में आपको ऐसी तरकीब निकालनी है जो यही खच्चर वाला नतीजा ले आए और आपका कोई नुकसान भी ना हो। जैसे आपको कोई जरूरी फाइल उसी दिन देनी है जब आपके परिवार में शादी है। अब या तो आप कोई एक कैंसल करिए या फिर खच्चर वाला रास्ता निकालिए। यानि कुछ घंटे ज्यादा लगाकर फाइल का काम डेडलाइन से पहले ही कर दीजिए और शादी वाले दिन शादी में चले जाइए। office वाले फाइल में देरी करने पर नाराज होंगे लेकिन काम समय से पहले कर दिया जाए तो भला कौन आपकी पीठ नहीं ठोकेगा?

कभी कभी आपको tightrope walker वाला तरीका अपनाना पड सकता है।

यहां आप प्राथमिकताएं तय करके काम नहीं कर रहे बल्कि सभी पर अपना बराबर ध्यान देकर सोच रहे हैं। ऐसी सोच वाला इंसान शादी और फाइल वाली सिचुएशन में क्या करेगा? वो पहले ये देखेगा कि वो किस तरह काम और निजी जिंदगी को बैलेंस कर रहा है और आगे किस तरह के कदम उठाकर ये बैलेंस बनाए रखा जा सकता है। अगर ये इंसान लंबे समय तक काम पर फोकस करता रहा है तो ये कहेगा कि अब परिवार की बारी है और शायद फाइल देने की बात रोक देगा। लेकिन वो ये बात भी याद रखेगा कि बैलेंस सही रखने के लिए अगली बार उसे काम को पहले रखना है। आप जिस भी अप्रोच पर चलते हों हमेशा ABC और D याद रखकर चलिए।

A का मतलब है assumptions और भी साफ शब्दों में बोला जाए तो challenging assumptions. अब फैक्ट तो फैक्ट होते हैं इनसे कोई इन्कार नहीं कर सकता। लेकिन सच्चाई सबके लिए अलग होती है। जैसे आइसक्रीम ठंडी होती है ये फैक्ट है लेकिन ये स्वादिष्ट होती है या नहीं ये फैसला यूनिवर्सल नहीं हो सकता। जिनको आइस्क्रीम पसंद ना हो उनके लिए अच्छे से अच्छा फ्लेवर कोई मायने नहीं रखेगा। पर both/and thinking को अच्छी तरह अपनाने के लिए ये जरूरी है कि आप इस बात को मान लें कि एक ही वक्त पर एक ही बात के सच अलग अलग हो सकते हैं।

B आता है boundaries के लिए। आपको तनाव से लडने की जरूरत नहीं है। आपको बस इसे खुद को पुश करते रहने के लिए काम में लाना है। ताकि आप अपने दायरे से बाहर आकर अपना horizon बढा पाएं।

C आता है comfort के लिए। पैराडॉक्स आपको तंग करने की अच्छी खासी ताकत रखते हैं। तो जब कभी आप थकने लगें इस थकान को स्वीकार करिए और कुछ वक्त आराम को दीजिए। यहां आराम से मतलब है uncertainty की ताकतों का सहारा लीजिए जैसे excitement, potential और wonder यानि जैसा होगा वैसा देख लेंगे।

और D आता है dynamism के लिए। Both/and thinking एक माइंडसेट है ना कि एक मौके के लिए बनाई गई स्ट्रैटेजी। इस बात का ध्यान रखें कि आप हर बार कोई ना कोई बदलाव ला रहे हैं, अपने काम पर फीडबैक ले रहे हैं और ऐसी चीजें दूर कर रहे हैं जो अब काम की नहीं लगती।

बडी कंपनियां पैराडॉक्स को ताकत बनाती हैं।

BOTH/AND THINKING
BOTH/AND THINKING

Both/and वाली सोच अपनाकर किस तरह मार्केट लीडर बना जा सकता है? एक कंपनी का उदाहरण लेते हैं जिसने ये कर दिखाया। यूनिलीवर का नाम हर कोई जानता है। दुनिया के हर कोने में अपनी छाप छोड चुकी कंपनी कुछ गलत फैसलों की वजह से दीवालिया होने की कगार पर थी। इसी दौरान both/and सोच वाले एक नए CEO ने बिजनेस की दुनिया में सबसे बडा इतिहास रच दिया। साल 2009 में जब Paul Polman ने कंपनी जॉइन की तो उस वक्त मंदी अपना असर दिखा चुकी थी। हालात इतने खराब थे कि कंपनी कैंटीन में अपने कॉम्पिटीटर के टी बैग इकट्ठे किए जा रहे थे। मैनेजमेंट को मंदी और क्लाइमेट चेंज जैसी चुनौतियों की वजह से वापसी की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी। पॉल भी इन सबसे अच्छी तरह वाकिफ थे। पर उन्होंने बाकी लोगों से हटकर कदम उठाया। बजाए ये सोचने के कि यूनिलीवर इन चुनौतियों से कैसे जीते, पॉल ने सोचा कि क्या कोई ऐसा तरीका हो सकता है जहां कंपनी इन चुनौतियों पर भी बात करे और मुनाफा भी कमाकर दिखा पाए? इस both/and thinking के नतीजे में Unilever Sustainable Living Plan सामने आया। यानि प्लानेट और कंपनी दोनों को बचाने की तरकीब। ये अप्रोच यूनिलीवर को मुसीबत से बाहर निकालने पर ही फोकस नहीं करती थी बल्कि आने वाले वक्त में सफलता की बात भी सोच रही थी। क्या आप sustainably और profitably दोनों के साथ काम कर सकते हैं? यूनिलीवर इस paradox को लेकर पक्की थी। कंपनी ने waste production घटाने, रिसोर्स के इस्तेमाल कम करने, sustainable मटेरियल को बढावा देने, छोटे देशों और फार्मों को अपने साथ मिलाने और दुगने मुनाफे का गोल तय किया।

हालांकि इस तरह के गोल्स ने कंपनी में अंदरूनी तौर पर काफी तनाव भर दिया था। लेकिन इस तनाव ने ही कुछ नया करने का जोश बनाए रखा। कंपनी को खर्चों में कटौती करने और sustainability बढाने के ढेरों तरीके मिले। जैसे प्लास्टिक और पाम oil के इस्तेमाल को कम से कम कर देना। इंडस्ट्री में sustainability के स्टैंडर्ड बढाने के उद्देश्य से इसने अपने कॉम्पिटीटर्स के साथ भी हाथ मिलाया। कंपनी ने developing countries में भी बहुत सूझबूझ और जिम्मेदारी के साथ कदम रखे जहां एक तरफ तो अपने ब्रांड्स की जगह मजबूत की वहीं दूसरी तरफ लोकल जरूरतों का भी ध्यान रखा। यानि पैराडॉक्स की मदद से पॉल और यूनिलीवर ने कंपनी की डूबती नैया को पार लगाकर ऐसी तेजी दिखाई कि अब ना सिर्फ मुनाफा ही मुनाफा बरस रहा है बल्कि प्लानेट का भला भी हो रहा है।

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आपने कभी serendipity शब्द सुना है? इसे “planned luck” की तरह समझिए जब आप किसी अनजानी चीज को मनचाहे नतीजे में बदल दें। एलेक्जेंडर फ्लेमिंग तो अपनी लैब में फ्लू की दवाई पर काम कर रहे थे कि अचानक उनके हाथ पेनिसिलीन लग गई। ये पूरी तरह से किस्मत की बात थी। लेकिन उन्होंने पेनिसिलीन की ताकत को पहचाना ये serendipity थी। जब both/and thinking आपकी आदत बन जाती है तो आपको हर जगह तनाव और उसके हल नजर आने लगते हैं। भले ही उस वक्त आप किसी paradox का सामना कर रहे हों या नहीं। खुद को इसकी आदत लगने दीजिए। हो सकता है आपके लिए भी serendipity का कोई पल इंतजार कर रहा हो।

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