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The Daily Stoic

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366 Meditations on Wisdom, Perseverance and the Art of Living

साल 2016 में किताब ‘द डेली स्टोइक’ रिलीज हुई थी, इस किताब में लेखक ने कोशिश की है कि वो रोमन अंपायर में रहने वाले फिलॉसफर का ज्ञान बता सकें जो वो रोजाना लिखा करते थे. ये किताब लेखकों के लिए भी काफी ज्यादा उपयोगी है, इस किताब के माध्यम से लेखक अपने आपको रिफ्रेश कर सकते हैं.

लेखक

Ryan Holiday & Stephen Hanselman
‘रयान हॉलिडे’ एक अमेरिकी लेखक, मीडिया रणनीतिकार, मार्केटर और सफल बिजनेस मैन भी हैं. कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में इनके लिखे हुए लेखन को पढ़ाया भी जाता है. इन्होने ‘ट्रस्ट मी, आई एम लाइंग’ जैसी प्रचलित किताबें भी लिखी हैं.
‘स्टीफन हेनसलमैन’ एक प्रकाशक और साहित्यिक एजेंट हैं, ‘द डेली स्टोइक’ एक लेखक के तौर पर इनकी पहली पुस्तक है.

स्टॉइक की फिलॉसफी ही कुछ अलग है

जीवन में आप कुछ भी नया करते हैं, कोई भी नई किताब पढ़ते हैं या फिर कुछ भी नया खरीदते हैं, आपकी कोशिश यही रहती है कि आपको कुछ अच्छा मिले जिससे आपका फायदा हो, इसलिए ये सवाल आना लाज़मी है कि इस किताब को पढ़कर आपको क्या मिलने वाला है? इसका जवाब भी बेहद सरल है, सबसे पहले तो आपको ज्ञान मिलेगा, जिसकी कोई कीमत नहीं होती है, इसके बाद आपको आज की जिंदगी को बेहतर ढंग से देखने का नजरिया भी मिलेगा, किताब को पढ़ने के साथ-साथ जो आपका मनोरंजन होगा, वो इस पॅकेज में कॉम्प्लीमेंट्री समझ लीजिए.

कई बार जीवन इतना कठिन हो जाता है, कि मोटिवेशन ढूंढना भी मुश्किल लगने लगता है, भले ही आप कितने भी अच्छे लोगों के इर्द-गिर्द रहते हों, लेकिन आपको सुकून नहीं मिलेगा. इस किताब में उसी नजरिये की बात कि गई है जिससे आप मोटिवेट रख सकें खुद को, इस किताब को पढ़ने के बाद आप एक सवाल का तो जवाब खुद ही ढूंढ लेंगे कि ‘मैं अच्छी जिंदगी कैसे जियूं’?

पहले अध्याय के साथ ही एक रोमांचक दुनिया में प्रवेश करने वाले हैं, जहाँ से आपको बहुत कुछ नया मिलेगा.

ज़्यादातर हम सोचते हैं कि फिलॉसफी मतलब किताबी कीड़ा, या फिर कोई ऐसा आदमी जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई हो और वो फिलॉसफी झाड़ रहा हो, लेकिन स्टॉइक की फिलॉसफी ऐसी बिल्कुल भी नहीं है. अगर आपको स्टॉइक बनना है तो आपको खुद से और अपने आस पास के लोगों से अवेयर होना होगा.

किसी भी फिलॉसफी की पहली शर्त होती है क्लियर थिंकिग. स्टॉइजिजम की पहली शर्त है कि आप खुद को समझें, मतलब सेल्फ एग्जामिनेशन,

दूसरी शताब्दी के ग्रेट स्टॉइक टीचर एपिक्टेटस कहते हैं कि इंसान उस दिन से फिलॉसफी को जानने लगता है जिस दिन से वो अपने आपको रियल जानने लगता है. उनके अनुसार अगर किसी को फिलॉसफर बनना है तो उसे सबसे पहले अपने आप को अच्छे से जानने की शुरुआत करनी होगी, इस जानने की प्रोसेस में उसे अपनी भावनाओं को समझना पड़ेगा, जिस दिन कोई ये करने लगेगा वो फिलॉसफर बनने के लिए आगे बढ़ चुका होगा.

वो कहते हैं कि ये सफर बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला है. अगर आप सच में कुछ नया सीखना चाहते हो, तो आपको अपने लक्ष्य को लेकर क्लियर होना होगा. ये लक्ष्य तो खुद को ही जानने का है, आप एक सवाल खुद से करना, आपको जवाब मिल जाएगा, ये सवाल है कि आप खुद को कितना जानते हो? कुछ कठिन सवाल खुद से करना, आपको खुद का ऐसा चेहरा देखने को मिलेगा जो आपने आज तक शीशे में भी नहीं देखा होगा.

खुद को समझने की प्रोसेस इतनी जटिल इसलिए है, क्योंकि इस प्रोसेस में हमको हमारी खामिया भी मिलती हैं. यही सबसे ख़ास बात भी है इस प्रोसेस की, इस पूरी प्रक्रिया की मदद से आप खुद की कमी को खत्म करने का काम कर पाओगे.

खुद के आकलन के साथ ये भी ज़रूरी है कि आपको पता रहे कि आपके आस-पास कौन-कौन है.

आपके करैक्टर का उसी तरह निर्माण होता है, जिस तरह के लोगों के साथ आप रहते हो. अगर आप ऐसे लोगों के साथ रहेंगे जो आपको आगे बढ़ने में मदद करें तो निश्चित ही आप बेहतर इंसान बन जायेंगे, वहीं दूसरी सिचुएशन में इसका उलट भी हो सकता है, इसलिए हमें हमारे आस-पास पॉजिटिव लोग रखने चाहिए.

रोमन फिलॉसफर सेनेका, बोलते हैं कि हमको हमेशा अपने दिमाग मे उस इंसान को रखना चाहिए, जिनसे हमको प्रेरणा मिलती है, इससे हमारे करैक्टर की ग्रोथ भी काफी हद तक बढ़ जाती है.

18वीं सदी के इकोनॉमिस्ट एडम स्मिथ भी यही सोचते थे, उन्होंने इस प्रक्रिया को नाम भी दिया था ‘इन डिफरेंट स्पेकटेटर’, उनके अनुसार ज़रूरी नहीं कि रियल आदमी आपको सुधारे, बल्कि उसकी सोच भी आपको बेहतर इंसान बना सकती है. आसान भाषा में अगर हम खुद को और अपने आस-पास के लोगों को समझ गये तो हमारे सामने तस्वीर साफ़ हो जायेगी.

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स्टॉइक और क्लैरिटी ऑफ़ थॉट्स

आज के दौर में जब डिजिटल वर्ल्ड लगातार अपने शबाब में बढ़ता ही जा रहा है, इसलिए इस समय लोगों के लिए फोकस बनाना काफी मुश्किल हो गया है, चारों तरफ डिस्टरैकशन है, अब यहां मायने ये रखता है कि आप अपने आपको मोटिवेट कैसे करते हो?

अब फोकस कैसे बनाना है, इसके कई तरीके हो सकते हैं.

उदाहरण के तौर पर हम याद करते हैं बिल बेलीचिक को, ये एक दौर में अमेरिकन फुटबाल टीम के न्यू इंग्लैंड पैट्रियोट के कोच हुआ करते थे, इन्होने एक तरीका अपनाया था, जिससे इनकी टीम के प्लेयर फोकस रहें और अपने खेल की तरफ ध्यान दें. कोच एक सिंपल लाइन प्लेयर्स से बोलते थे कि ‘डू योर जॉब’, ये तरीका था उनका प्लेयर्स को हैंडल करने का, अब हम एक और किस्सा याद करते हैं, ये किस्सा है रोमन एम्परर का. स्टॉइसिजम के अनुसार, हर टास्क को हमे ऐसे करना चाहिए कि जैसे ये हमारा आखिरी टास्क हो, अगर हम अपनी जिंदगी में ये रुल फॉलो करते हैं, तो रिजल्ट कुछ और ही देखने को मिलेगा.

मार्कस औरुलियस की भी सलाह आप मान सकते हैं, उनके हिसाब से अगर आपके लिए फोकस करना इतना मुश्किल हो रहा है तो आप खुद का भी एक स्लोगन बना सकते हो, जैसे कि ‘ये काम मेरे सिवा कोई नहीं कर सकता है..’ या फिर आप सोच सकते हो कि ‘कहां पड़े हो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में..’ कुछ भी ऐसा, जो आपको मोटिवेट करके रखे, अपने मोटिवेशन के लिए याद रखियेगा कि आपका लक्ष्य क्या है? अपने लक्ष्य को आपको नहीं भूलना है, क्योंकि जैसा भी रास्ता आप तैयार करोगे आपकी मंजिल भी कुछ वैसी ही बनेगी.

एक और तरीका है अपने आपको फोकस रखने का, लेकिन उसके पहले आप देखिए कि क्या ऊपर के तीन तरीके आपके लिए सही नहीं है? अगर नहीं हैं, तब आप इस तरीके की तरफ बढ़िए, ये तरीका क्या है?

इसके अनुसार आप मान लीजिये कि कुछ चीजें जीवन में होती हैं, जिन पर हमारा वश नहीं चलता है, हमें इस बात को मान लेना चाहिए कि हर चीज को हम कंट्रोल नहीं कर सकते हैं, कुछ चीजों को समय के हाथों में ही छोड़ना सही होता है.

स्टॉइक के हिसाब से आप अपने दिमाग को कंट्रोल कर सकते हैं, आपको अपनी बॉडी को कंट्रोल करने के बजाए अपने दिमाग पर काम करना चाहिए, यहीं से फोकस होने का रास्ता भी निकलता है.

अब प्रैक्टली बोला जाए तो ऊपर की बातों को समझकर अब आप तैयार हैं कि आप एक अच्छा रूटीन बना सकें, आपके रूटीन में ज्यादा समय इस पर खर्च होना चाहिए कि मैं अपने आपको और बेहतर कैसे जान लूं, कि मैं और बेहतर हो जाऊ. जब आप अपने आपको बेहतर बनाने के लिए आगे बढ़ जाओगे तो पीछे-पीछे ये दुनिया अपने आप बेहतर हो जायेगी.

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट एक अजीब तरह के इंसान थे, अमेजन में नदी की तलाश में वो करीब-करीब मर चुके थे, उन्होंने सफारी पर हजारों जानवरों का वध किया था, इसी के साथ 59 साल की उम्र में उन्होंने इसलिए अनुमति मांगी थी कि वो पहले विश्व युद्ध में एक सैनिक के तौर पर लड़ सकें.

थियोडोर रूजवेल्ट ने अपने जीवन में करियर में बहुत अच्छा किया था, फिर भी उनके इस तरह के बर्ताव ये बताते हैं कि वो अपने एक्शन पर कंट्रोल नहीं कर पाते थे, क्योंकि उनका कंट्रोल उनके दिमाग पर भी नहीं था.

रूजवेल्ट की ही तरह हम लोगों में से भी अधिकतर लोग वही काम करते हैं जो हमारे इम्पल्स करवाते हैं, लेकिन आपको याद रखना है कि आपको रूजवेल्ट ट्रैप में फंसना नहीं है.

आपका ज्ञान ही आपको बतायेगा कि आप जो काम कर रहे हो, वो इमोशनल इम्पल्स में बहकर नहीं कर रहे हो, इसलिए सबसे ज़रूरी है कि आप ज्ञान लेते रहिये, जब भी आप कोई फैसला करने जाएँ तो सबसे पहले अपने इमोशन के बस्ते को कहीं और रख दें, फिर सोचें, अब आप बेहतर फैसला ले सकते हो. कभी ऐसा भी हो सकता है कि आपको कोई फैसला इसलिए लेना पड़े कि वही एक मात्र रास्ता था, तब आपकी मदद प्री मैडिटेशन करेगा.

हमेशा सतर्क रहिये अपने एक्शन को लेकर

स्टॉइक ये जानते हैं कि सभी लोग उतने होशियार नहीं हैं जितना हम मानते हैं, ये सच्चाई है, लेकिन इसका समाधान क्या है? वो ये है कि सबसे पहले तो हम पहचान लें कि हमारी कमी क्या है? जिस दिन हम अपनी कमियों को पहचान लिए, उस दिन हमारी खुशी का रास्ता खुल जाएगा.

इसकी शुरुआत आप अपनी थिंकिंग को टेस्ट करके कर सकते हैं.

‘ब्लिंक’ किताब के लेखक के अनुसार इंसानी दिमाग अपने एक्सपीरियंस के अनुसार रियेक्ट करता है, ये अनुभव सही भी हो सकते हैं और गलत भी, ये अलग-अलग इंसानों के नेचर पर डिपेंड करता है.

इस हिसाब से कभी भी आप कोई बड़ा फैसला लें तो सबसे पहले कुछ सेकंड्स के लिए रुक जाइए, एक सवाल उसी वक्त खुद से पूछिए कि इस फैसले से क्या फर्क पड़ने वाला है? कहीं आपके इस फैसले से किसी का नुकसान तो नहीं हो जाएगा? अगर आपको लगे कि अभी एक बार और सोचने की जरुरत है, तो फिर रुक जाइए, इस प्रोसेस से आप अपनी थिंकिग को बेहतर समझ सकोगे, थिंकिग के अलावा भी आप दिमागी सिस्टम को भी समझ जाएंगे.

खुद के ऊपर ये छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट करके आप कई बड़े अच्छे फैसले करने लायक बन जाओगे.

जब अपने नेचर के पैटर्न को जांच करने की बात आती है तब भी इसी टेकनिक का इस्तेमाल किया जाता है. ये भी कहा जाता है कि मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट एलिस ने स्टोइकवाद को इसी तरीके से इतना प्रभाव शाली बनाया था.

यहाँ तक CBT पेशंट्स को भी यही कहा जाता है कि वो अपने एक्शन और थॉट्स पर ध्यान दें, इसके बाद उन थॉट्स से उनको क्या फायदा हो रहा है, इस पर भी ध्यान दें.

रोमन सम्राट मार्कस ऑरेलियस के विचार भी इसी तरह थे, उन्होंने अपने रीडर्स से कहा था कि अपने थॉट्स और एक्शन पर फोकस करें, फिर आकलन करें कि किस एक्शन से क्या फायदा हो रहा है और क्या नुकसान हो रहा है.

अगर आप सोच रहें हैं कि क्या कोई दूसरा तरीका है ये पता लगाने का कि हमारी सोच में क्या कमी है? तो आपसे बता दें कि एक और तरीका है, वो तरीका है कि आप अपनी आदतों को लेकर हमेशा अलर्ट मोड में रहें, अपने शरीर का अलर्ट मोड चालू कर दीजिये कुछ दिनों के लिए, फिर ओब्सर्व करिए अपने आपको खुद ही. क्योंकि आपकी सोच का इलाज अगर कोई कर सकता है तो वो आप खुद हो. वैसे तो बहुत से मनो वैज्ञानिक हैं, लेकिन आप ही बताइए कि आपको आपसे बेहतर कौन ही जानता होगा?

इसलिए अलर्ट मोड में रहिये, अपने एक्शन पर नजर रखिये, ध्यान रखिये कि आपका फैसला चाहे वो छोटा हो या बड़ा, लेकिन भावनाओं में बहकर नहीं होना चाहिए. अगर आप अपने भावनाओ को पकड़ने लायक हो गये, तो समझ लीजिये कि आपके हाथों में वर्ल्ड कप बस लग ही गया.

ये दुनिया सम्भावनाओं से भरी हुई है, हम लोग ही दिनभर में बहुत अलग-अलग सिचुएशन से रूबरू होते रहते हैं, लेकिन हमको समझना चाहिए कि अगर हम किसी जगह नाकाम भी हो रहे हैं तो कोई बुरी बात नहीं, दूसरे रास्ते में हमें सफलता मिलेगी, रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन अल्टीमेट मंजिल तो ख़ुशी ही है.

हम कोशिश कर सकते हैं कि हमारे गोल्स जितने क्लियर हो सकें उतना क्लियर रहें, हमे पता होना चाहिए कि हमारी प्राथमिकताएं क्या-क्या हैं?

हमेशा कोशिश करिए अपना बेस्ट वर्जन बनने की, इसके साथ एक टेकनिक का और आप इस्तेमाल कर सकते हैं, वो टेकनिक ये है कि आप जिसे भी अपना आइडियल मानते हैं, कोशिश करिए उसी की तरह एक्ट करने की, उसी की तरह जीवन जीने की, हो सकता है कि इस एक्टिंग से आपको इतना फायदा हो, जितना कभी ना हुआ हो.

मार्कस ऑरेलियस लोगों की एक आदत को पॉइंट आउट करते हैं, वो ये आदत है, कि हर काम को कल के ऊपर छोड़ देना, आप भी कई लोगों को देखे होंगे, किसी भी काम के लिए बोल देते हैं कि ‘कल देखेंगे’. इस पर लेखक बोलते हैं कि अगर आपको अपने अंदर बदलाव लाना है, तो आज लेकर आइये, वो कल कभी नहीं आता है, और इस आदत को तो सबसे पहले उखाड़ कर बाहर फेंक दीजिये.

आप सोचिये कि आप अर्जुन हैं, और आपको चिड़िया की आँख में ही निशाना मारना है, बस फिर क्या बाण तान दीजिये और सही दिशा में टार्गेट करिए, आधी दिक्कत तो ऐसे ही खत्म हो जाएगी.

मन की शक्ति, फोकस और जज्बा बहुत है आपके लिए इस लड़ाई को जीतने के लिए, कई दिक्कत तो दिक्कत हैं भी नहीं, जितना आप उन्हें बनाकर बैठे हुए हो, स्टॉइकवाद यही सिखाता है कि हमेशा सफर का आनंद लीजिये क्योंकि जो मजा सफर में है, वो मजा आपको मंजिल में नहीं आएगा. आपने एक गाने की लाइन तो सुनी ही होगी… सफ़र खूबसूरत है मंजिल से भी.

उम्मीद और दिक्कत के बीच फंस कर मत रह जाइए

प्लान बनाना अच्छी बात है, लेकिन क्या सिर्फ प्लान से ही मंजिल मिल जाती है? नहीं, बिल्कुल नहीं, मंजिल के लिए हमें पहले रास्ता ढूंढना ही पड़ेगा, बिना रास्ते के आपका प्लान बेकार है.

स्टॉइकवाद भी हमें यही सिखाता है कि हम पहले स्वतंत्र होकर रास्ता बनाए, हम पहले अपने दिमाग को फ्री करके सोचने दें, आपने बहुत सारी उलझनों को अपने दिमाग में बैठा लिया है, पहले तो उन्हें साइड में रखिये, फिर आप समझिये स्टॉइकवाद को. ये आपको बताता है कि मंजिल तक तो पहुंच जाओगे, लेकिन पहले रास्ता तो ढूंढ लो, फिर आगे की सोचना.

अब अगर आप क्लियर हो कि आपकी मंजिल वो है, फिर आप प्लान बनाओ कि किस रास्ते से जाओगे, अगर आपको मुंबई से बनारस जाना है तो तीन ऑप्शन हैं, पहला पैसा खूब हो तो फ्लाइट से निकल जाइए, और ज्यादा पैसा हो तो बाय रोड भी जा सकते हो, बजट में जाना है तो रेल पकड़ लो, मंजिल तो आपको मिल ही जाएगी, तीनो रास्तों से, लेकिन सफर का आनंद सभी का अलग-अलग है.

कई लोग एक अप्रोच और रखते हैं, वो है बैक अप प्लान, मतलब अगर इसमें कुछ ख़ास नही हुआ तो वो दूसरा वाला कर लूँगा, क्या आपको बैकअप प्लान के साथ सफर करना है? ये फैसला आपको ही करना है.

जर्नलिस्ट विलियम सीब्रूक का किस्सा आपको सुनाते हैं, ये काफी पुराना किस्सा है, करीब 1933 का होगा, लेखक ने इस किताब में जिक्र किया है, किस्सा कुछ यूं है कि ब्रूक को दारु पीने की लत लगी हुई थी, ऐसी लत कि उनका इलाज भी चल रहा था. ट्रीटमेंट के दौरान उनको एसाइलम तक लगने लगा था, जिससे वो काफी कष्ट में थे, लेकिन फिर एक दिन उन्होंने सोचा कि अब उनको इसके साथ ही जीना है तो क्यों ना एसाइलम को एन्जॉय किया जाए, उन्होंने अपने जीने का पर्सपेक्टिव थोड़ा सा बदला और उनका समय अच्छा जाने लगा, ये तो एक किस्सा है, आपके चारों तरफ ही पता नहीं कितने एग्जाम्पल पड़ें होंगे.

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स्टॉइकवाद बड़ी ही शानदार सीख देती है, ये जीवन को लेकर बताती है कि लाइफ में हर चीज एक दूसरे से जुड़ी हुई है.

स्टॉइकवाद के अनुसार उद्देश्य ही ड्यूटी सिखाता है, मतलब जब आपके पास आपका लक्ष्य क्लियर होगा तो आप उसके पीछे बिल्कुल सावधानी से सतर्क होकर जाओगे, आपके अंदर तभी अनुशासन भी आएगा, लक्ष्य पाने के लिए अनुशासन की बहुत जरुरत होती है.

स्टॉइकवाद के अनुसार गोल के साथ आपके पास वो उद्देश्य भी होना चाहिए कि उस गोल को अचीव करके आप क्या करने वाले हो, अगर आपके पास उद्देश्य नहीं है, तो उस गोल का कोई मतलब नहीं, आप गलत दिशा में बढ़ रहे हो, इसलिए उद्देश्य बनाइए. अब आपके मन में सवाल आ सकता है कि उद्देश्य है क्या? मान लीजिये कि

पैसा कमाना आपका गोल है, तो उस पैसे से लोगों की मदद करना, या खुद के परिवार को अच्छी लाइफ देना आपका उद्देश्य होना चाहिए. अगर आप बस ये सोचकर कि आपको पैसे कमाने हैं, और मार्केट में उतर जाओगे तो आप अपने साथ सबके विनाश का कारण बन जाओगे.

मार्कस ऑरेलियस को ही आप देखिए, वो एक सम्राज्य के राजा थे, उनके ऊपर पर्सनल, पॉलिटिकल, इंटरनेशनल कितना प्रेशर रहता होगा, लेकिन उन्होंने अपने जीवन में एक मूल मन्त्र का पालन किया था, वो ये है कि ड्यूटी कम फर्स्ट, वो चाहे प्रोफेशनल ड्यूटी हो, या फिर दूसरों के प्रति उनकी जिम्मेदारी.

वो स्टॉइकवाद का ही नतीजा था कि इतने बड़े साम्राज्य को चलाने वाला आदमी ये मानता था कि सभी लोग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, ये दुनिया इंटर कनेक्टेड है.

इसी के साथ मार्कस ऑरेलियस अपने मैडिटेशन यानी वह जो खुद के लिए रोजाना नोट्स लिखा करते थे उसमें उन्होंने ज़िक्र किया है कि दूसरों के लिए काम करने के लिए ही कुदरत ने आपको बनाया है. उनके अनुसार हम सब नेचर से ही बने हुए हैं, हमको जितने प्यार से ये नेचर रखता है और कोई नहीं रख सकता है, हमें नेचर का सम्मान करना चाहिए.

एक्शन के साथ लक्ष्य पर फोकस करिए

स्टॉइकवाद ये बताता है कि अपने रिजल्ट की तरफ आगे बढ़ते रहिये, घबराइये मत और रास्ते से भटकिये भी नहीं, स्टॉइकवाद की यही खासियत ही है कि इसमें नजर लक्ष्य को पाने में लगाई जाती है, भले ही कठिनाई कितनी भी आयें. जीवन में कई बार ऐसा समय आ जाता है जब आपको भी लगता होगा कि आप कहीं फंस से गये हो, उस फंसने में आपको लगता है कि आपकी जिन्दगी लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ ही नहीं रही है.

इस किताब में लेखक बताते हैं कि ऐसा आर्टिस्ट के साथ काफी ज्यादा होता है, क्योंकि वो अपनी क्रिएटिविटी को बढ़ाने के लिए लगातार लोकेशन बदलते रहते हैं, इन्ही सब में कई आर्टिस्ट को ऐसा लगता है कि उनका जीवन कहीं फंस सा गया है.

अगर कोई जगह देखकर काम करेगा तो कुछ ऐसा ही होगा, इसलिए इंसान अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर हो जाना चाहिए, भले ही जगह कैसी भी हो, लक्ष्य देखिए और आगे बढ़ते रहिये.

स्टॉइकवाद हमें और भी रियल रहना सिखाता है, उसके हिसाब से भले ही हम जो करें उसमे हम कच्चे हों, लेकिन इसका ये मतलब तो हरगिज नहीं कि हम कोशिश करना ही छोड़ दें, अगर हमने कोशिश करना छोड़ दिया तो हम कभी भी वो अचीव नही कर पायेंगे, जिसकी लालसा हमको है.

एक अजीब सी सोच होती है लोगों के अंदर, वो सारी जिन्दगी उसी सोच के साथ जीते रहते हैं, वो ये है कि ‘या तो पूरा या कुछ नहीं’ इस सोच को मनोवैज्ञानिक भी सिरे से नकार देते हैं, वो भी कहते हैं कि इस तरह की सोच इंसान को नीचे लेकर जाती है, आपको हर सिचुएशन को प्रैक्टिकल तरीके से लेना चाहिए, और उस वक्त ये सोचना चाहिए कि इस समय आपकी भलाई किस सिचुएशन को मानने में है.

एक किताब है ‘रुल ऑफ़ रैडिकल’ इस किताब के लेखक ने कहा है कि हमें कभी आइडियलिस्म को अपने गोल्स या फिर टार्गेट के बीच में लेकर नहीं आना चाहिए, एलिनस्की कहती हैं कि हमें वर्ल्ड को उसी तरह एक्सेप्ट कर लेना चाहिए, जैसी वो है.

इसी के साथ स्टॉइकवाद हमें ये सीख देता है कि एक समय में हमें एक सही फैसला करना चाहिए. दुनिया को बदल सकते नहीं, वो हमारे हाँथ में नहीं है, लेकिन खुद को बदलना कल भी हमारे हाथों में था, आज भी है, और कल भी रहेगा, इसलिए ज़िन्दगी जीते रहिये, और आगे बढ़ते रहिये.

स्टॉइकवाद के अनुसार हमारे साथ कुछ भी हो, कैसी भी सिचुएशन आए, लेकिन हमको हमेशा याद रखना चाहिए कि हम कौन हैं? वो कहते हैं कि हमारी आत्मा में एक पूरा संसार वास करता है.

हमकों फिजिकल कुछ भी हो, हमारी आत्मा हमेशा जिन्दा रहती है, उस आत्मा को सिर्फ हमसे डर है, और किसी से नहीं. ये मेंटालिटी हमकों सिखाती है कि हमें हमेशा खुद पर खुद से ज्यादा भरोसा होना चाहिए, हमें हमेशा अपने उपर रीलाइ करना चाहिए, सिचुएशन के ऊपर कभी हमें रीलाइ नहीं करना चाहिए.

स्टॉइकवाद हमें बताता है कि अगर अभी हमारे सामने कोई विकट संकट भी खड़ा है तो वो हमको मज़बूत बनाने के लिए हमारे पास आया है, अमेरिकी पायलट और नेवी के वाइस एडमिरल जेम्स स्टॉकडेल इसका जीता जागता सबूत थे. जब वियतनाम में उनके विमान को गोली लगी थी, तो उन्हें लगा था कि अब उन्हें बहुत ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा. नीचे उतरने के बाद भी वो रियलिटी में रहे.

इसके बाद जेम्स स्टॉकडेल ने प्रिजनर ऑफ़ वॉर में साढ़े 7 सालों का लंबा वक्त काटा, इन साढ़े 7 सालों के बीच उनके साथ काफी बुरा बर्ताव किया गया, टॉर्चर किया गया, लेकिन उन्होंने कभी भ्रम की स्थति अपने दिमाग में नहीं पाली कि वो जल्द रिहा कर दिए जाएंगे. वो हमेशा सच्चाई में जीते रहे.

जेम्स स्टॉकडेल जानते थे कि सच में रहना ही खुद को जीवित रखने का तरीका है, इसलिए हम सबको हमेशा प्रेजेंट में रहना चाहिए, जितना कम आप भ्रम में रहोगे, दुःख भी उतना ही कम आपको भोगना पड़ेगा. स्टॉइकवाद को जेम्स स्टॉकडेल मानते थे, वो जानते थे कि वो सिचुएशन में कोई भी बदलाव ले आ नहीं सकते हैं, इसलिए सिचुएशन के प्रति उन्होंने अपना नजरिया ही बदल लिया था. सब खेल नज़रिए का ही है, अब आप समझिये कि आप कैसे खिलाड़ी हैं.

पूरी दुनिया एक दूसरे से इंटर कनेक्टेड है

रोमन अंपायर के पुरातन काल में बस मनोरंजन के लिए मानव और जानवरों दोनों को मार दिया जाता था, ये बोहोत कॉमन था, क्रूरता अपने चरम पर थी. लोगों को गुलामी के लिए बेच दिया जाता था, तो ऐसे माहौल में पॉजिटिव एनवायरनमेंट की उम्मीद करना तो बेईमानी ही होगी.

फिर सवाल ये उठता है कि ऐसे माहौल में स्टॉइकवाद में क्या खासियत थी कि वो अपने चरम पर पहुंच गया था? वो खासियत ये थी कि स्टॉइकवाद ने उस दौर में भी देख लिया था कि इंसान हो या जानवर. इस दुनिया में सब इंटर कनेक्टेड हैं.

मार्कस ऑरेलियस अपने मैडिटेशन में बताते हैं कि कैसे ये दुनिया इंटर कनेक्टेड है. वो बताते हैं कि मधुमक्खी को देखिए, कैसे एक साथ रहती हैं, जैसे इंसान रहते हैं. इसको दूसरे नजरिये से देखिए कि कोई भी चीज जो कम्युनिटी के लिए बुरी होगी, वो इंडिविजुअल के लिए भी बुरी ही होगी.

इस थ्योरी के अनुसार हमें हमेशा अपनी कम्युनिटी के लिए कुछ अच्छा करते रहना चाहिए, लेकिन वो चीज़ एथिक्स के साथ होनी चाहिए, करैक्टर का सीधा सम्बन्ध एथिक्स से भी होता है, इसका सिंपल तरीका है कि जब भी आप कुछ करें, एक बार रुककर खुद से सवाल करें कि ‘क्या जो मैं कर रहा हूँ, वो सही है?’ अगर सही है तो फिर अपने फैसले के साथ आप आगे बढ़िए, ऊपर के अध्याय में आपने काफी कुछ पढ़ लिया है, वो सब भी दिमाग में बैठाकर रखियेगा.

इंसान की समान्य सी आदत होती है, कि वो उम्मीद को सही समझता है और डर को बुरा समझता है, लेकिन स्टॉइकवाद दोनों ही पक्ष के प्रति अपना एक अलग ही नजरिया पेश करता है.

स्टॉइकवाद का सीधा सा कहना है कि ना ही उम्मीद को लेकर ज्यादा खुश होइए, और ना ही डर का माहौल बनाइए, आप बस अपने जीवन की रवानी में मस्त रहिये.

सिंपल सी बात है कि जीवन आपका उतना ही सिंपल और सजग होगा, जितना आप उसे बनाओगे, इसलिए कठिन से कठिन हालातों में भी इंसान को अपनी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, क्योंकि नेचर ने आपको आपका शरीर तोहफे के तौर पर प्रदान किया है, इस शरीर की इज्जत भी उसी तरह कीजिये.

उदाहरण के तौर पर हम फिर चलते हैं यूएस के एक प्रेसिडेंट के पास, जिनका नाम है फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट, उन्होंने अपना जीवन बड़ी ही ईमानदारी के साथ और संघर्ष करते हुए बिताया, लेकिन जब वो 39 साल के हुए तब अचानक उनको पोलियो नामक बीमारी ने अपने कब्जे में कर लिया. रूजवेल्ट को एहसास हुआ कि वो इस बीमारी का कुछ नहीं कर सकते हैं, लेकिन वो अपने रिएक्शन का ज़रूर कुछ ना कुछ कर सकते हैं, फिर उन्होंने फैसला किया कि वो अपने रिएक्शन को कंट्रोल करेंगे, उन्होंने अपनी बीमारी को एक्सेप्ट कर लिया था.

रूजवेल्ट ने अपने हालातों के आगे घुटने नहीं टेके, बल्कि चौड़ी छाती के साथ उनका सामना करने का जज्बा दिखाया, उसके बाद क्या हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज है. और आज उनकी कहानी हर शख्स तक पहुंचनी चाहिए, जिसे डिप्रेशन ने अपने घेरे में ले लिया है, जो आज अपनी जिन्दगी को खत्म करना चाहता है, उन्हें इनकी कहानी से प्रेरित होना चाहिए.

एक और अच्छा उदाहरण है नागरिक अधिकार नेता मैल्कम एक्स का, जिन्हें स्ट्रगल ऑफ़ सिविल राइट्स के दौरान सजा हुई थी, उस सजा के समय को उन्होंने व्यर्थ नहीं जाने दिया बल्कि खुद कुछ सीखने का प्रयास किया, और उनके अच्छे आचरण के कारण जब उनकी रिहाई जल्दी हुई तब तक उन्होंने अपने जीवन को बदल दिया था. रिहाई के समय में वो पढ़े-लिखे और मोटिवेटेड इंसान बन चुके थे. उनका एग्जाम्पल बताता है कि हम ज़िन्दगी में हर समय कुछ अच्छा कर सकते हैं, नेगेटिव सिचुएशन में भी जो अपार्चुनिटी ढूंढ निकाले असली इंसान तो वही है.

अब समय आ गया है जब आप अपनी पूरी ताकत को एक जगह इक्कठा करें. जितनी भी ताकत आपने डर में गवा दी है, सबको फिर से खुद के अंदर इक्कठा करिए, क्योंकि सक्सेस को पाने के लिए बहुत ज्यादा एनर्जी की जरुरत पड़ने वाली है, ये एनर्जी आपको कोई और नही बल्कि आप खुद देंगे.

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पॉवर की गेम को समझिये

जब 500 साल पुराना रोमन अम्पायर खत्म हुआ तब उसमे जो लांगेस्ट लाइफ स्पैन था वो 122 साल का था, यहां ये बात समझनी चाहिए कि हर चीज जो इस दुनिया में आई है, उसे एक दिन खत्म होना ही है, इसलिए हमें इस खत्म होने वाली स्थति को भी एक्सेप्ट करते आना चाहिए.

इसको समान्य भाषा में आप अपने दोस्त, यार या फिर रिलेशन शिप से भी जोड़ सकते हैं, कि आप अगर किसी के साथ रिश्ते में जा रहें हैं, तो पहले ही आपको तैयार रहना चाहिए कि एक दिन ये रिलेशनशिप खत्म भी ज़रूर होगी, नथिंग इज परमानेंट इन डिस वर्ल्ड, ये बात समझनी बहुत ज़रूरी है. हम यही बात नहीं समझते हैं, फिर अपने ईगो से लड़ाई करते हैं.

स्टॉइकवाद हमें खत्म होने के सिद्धांत को एक्सेप्ट करना सिखाता है, डेथ होना दुःख की बात है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन ये एक ऐसा यथार्थ भी है, जिसे कोई बदल नहीं सकता है.

डेथ एक जिंदगी जीने के लिए बहुत बड़ी मोटिवेशन का रीजन भी बन सकती है, अब आप सोचेंगे कि वो कैसे? वो ऐसे कि सोच लीजिये कि आपके पास अब कुछ ही हफ्ते बचे हैं, फिर अब आप अपनी जिन्दगी को क्या पूरी स्पीड के साथ नहीं दौड़ाएंगे, यहां दौड़ाना भी छोटा शब्द है, जिसके पास कुछ ही हफ्ते हैं, उनको तो उड़ाना चाहिए, आपका हर पल ऐसे बीतना चाहिए जैसे किसी ने पूरी जिन्दगी ना जी हो, इसलिए डेथ को भी अपने फायदे के लिए यूज करिए, वो भी आपसे डरने लगेगी कि बड़ा खतरनाक आदमी है यार मुझसे भी मोटिवेट हो जाता है.

स्टॉइक के अनुसार अगर डेथ से सब कुछ खत्म ही हो जाता है तो फिर इससे डरने की तो कोई जरुरत है ही नहीं, इससे आपके दर्द भी खत्म ही हो जायेगा.

अगर आपको फिलॉसफी समझनी है तो डर शब्द बहुत छोटा हो जाता है, क्योंकि फिलॉसफी आपको रियल अप्रोच देती है कि चीजों को ठीक वैसे ही देखिए जैसी वो हैं, हर चीज को देखने का एक नजरिया होता है, इस नजरिये में ही पूरा खेल छुपा है, अगर आपने इस खेल को समझ लिया तो आपको खिलाड़ी बनने से कोई रोक ही नही सकता है.

इन सभी अध्यायों को पढ़कर आपको पता चला होगा कि जिंदगी में एक अप्रोच ही बहुत होती लाइफ चेंजिंग मूमेंट बनने के लिए, अब वो अप्रोच के लिए आपको मोटिवेशन भी खुद के अंदर या आस-पास ही मिल जाएगा, इसी समाज में ऐसी बहुत सी कहानियां, जिन्हें सुनकर आप कहेंगे कि ‘वाह, अगर ये कर सकता है, अगर ये लड़ सकता है, अगर ये जीत सकता है, तो मैं क्यों नहीं?’ इस क्यों का जवाब ऊपर 12 अध्याय में दे दिया गया है, और अगर आप पूरा पढ़कर यहां तक पहुंचे हैं तो सार आपके जहन में उतर भी चुका होगा. जब जिंदगी की रणभेरी शुरू ही हो गई है तो फिर देर किस बात की, दौड़ना शुरू कर दीजिये, देखिए किसी प्लेटफार्म पर सक्सेस आपका इंतजार कर रही होगी.

स्टॉइकवाद सभी फिलॉसफी से ऊपर है, ये जीवन को बेहतर बनाने में मदद करती है, लेकिन इसका पथ भी इतना आसान नहीं है, इस पथ की डगर में आपको खुद के साथ अपने आस-पास के लोगों को भी समझना पड़ता है, आत्म चिन्तन करना पड़ता है, आपका अल्टीमेट लक्ष्य भी तो ख़ुशी है, तो खुशी की कीमत इतनी आसान नहीं हो सकती है, वैसे एक फैक्ट ये भी है कि ख़ुशी का आप मोल नहीं लगा सकते हैं, क्योंकि आत्मिक ख़ुशी एक अनंत भावना है, जिसका कोई अंत नहीं, ऐसी ख़ुशी आपको तभी मिलेगी जब आपने अपना जीवन सही मार्ग में चलकर बिताया हो, Stoicism आपको जीवन में बेहतर फैसले लेने में मदद करती है, इस प्रोसेस की मदद से आप जीवन में प्रगति के मार्ग पर ही चलोगे. इस प्रोसेस में सेल्फ मोटिवेशन का भी बहुत बड़ा हाथ है, आपको आज के समय में ज़रूरत है कि आप सेल्फ मोटिवेट रहें, सही फैसले करें, सोसाइटी और कम्युनिटी से जुड़कर रहें.

बाहरी वस्तुओं में ख़ुशी तलाश करना आज से अभी से बंद कर दीजिये, क्योंकि ऊपर आपको बताया गया है, और ये चीज वैज्ञानिक भी मानते हैं कि आंतरिक ख़ुशी ही मुख्य है, उसे कोई खरीद नहीं सकता है, जब तक आप अपनी खुशियों को वस्तुओं में तलाशेंगे, तब तक आप भटकते ही रहेंगे, अच्छी चीजों की तारीफ करने में कोई बुराई नहीं है, आप करिए, लेकिन ख़ुशी ढूँढने के लिए सोशल मीडिया में मत जाइएगा, बल्कि अपने आस-पास वातावरण में देखिएगा, आपको अपना लक्ष्य नज़र आ जायेगा.

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