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The Comfort Crisis

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The Comfort Crisis

डिस्कंफर्ट में जीना सीखिए

द कंफर्ट क्राइसिस (2021) मॉडर्न जमाने की फिज़िकल और मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम के सल्यूशन देती है। इसके लिये आपको डिस्कंफर्ट में कंफर्टेबल होना सीखना होगा, जिसका मतलब जंगलों में कुछ वक्त गुजार कर अपने आप को मजबूत बनाना या मौत के बारे में सोचने तक कुछ भी हो सकता है।

लेखक  Michael Easter

मिशेल ईस्टर मेंस हेल्थ मैगजीन के अवॉर्ड विनिंग राइटर और एडिटर हैं। वह लास वेगस की यूनिवर्सिटी ऑफ़ नवादा में जनरलिज्म पढ़ाते हैं। कंफर्ट क्राइसिस उनकी पहली किताब है।

अपने कंफर्ट जोन से निकलना और डिस्कंफर्ट में जीना सीखिए

क्या आप जहां भी हैं जो कर रहे हैं उसमें कंफर्टेबल महसूस कर रहे हैं? एक कंफर्टेबल काउच पर बैठे हैं, या फिर ऐसी कार चलाते हैं? हम जैसे बहुत सारे लोगों के लिए मॉडर्न लाइफ बहुत कंफर्टेबल है खासतौर पर जब हम इसे अपने पूर्वजों की जिंदगी से कंपेयर करें तो। लेखक ने अपने कंफर्ट ज़ोन से निकलकर, एक महीना अलास्का के जंगलों में शिकार करते हुए बिताने का फैसला किया, जहां पर वह सोचते हैं कि भूटान में उनकी मौत होगी। उन्होंने क्या पाया? हम सब अपने आप को मेंटल और फिजिकल डिस्कंफर्ट में डालकर बहुत कुछ सीख सकते हैं। यह हमारे लिये सच्ची खुशियों का रास्ता बन सकता है। इस समरी मे आप जानेंगे, कि कैसे सिर्फ 3 दिन जंगलों में गुजारना आप को बदल सकता है? क्यों हमें अपने पूर्वजों की तरह खाना और एक्सरसाइज करना चाहिए, और क्यों भूटान के लोग दुनिया के कुछ सबसे ज्यादा खुशहाल लोगों में से हैं? मॉडर्न जिंदगी कंफर्टेबल तो है लेकिन हमें खुशहाल नहीं रख सकती।

लेखक हर सुबह अपने सॉफ्ट और कंफर्टेबल बेड से उठते हैं। गाड़ी चलाकर ऑफिस जाते हैं और वहां एक शानदार चेयर पर बैठकर काम करते हैं। जैसे ही वह बोर महसूस करते ही अपना स्मार्टफोन देखने लगते हैं। वह अपनी इवनिंग एक कंफर्टेबल काउच पर बैठकर जंक फूड खाते हुए टीवी देखने में गुजारते थे। यहां तक कि उनका एक्सरसाइज रूटीन भी बहुत कंफर्टेबल था वह एक एयर कंडीशंड जिम में एक्सरसाइज करते थे। कुल मिलाकर उनकी जिंदगी बढ़िया चल रही थी। उन्होंने यह पीसफुल और कंफर्टेबर लाइफ स्टाइल हासिल करने के लिए बहुत मेहनत से शराब का नशा छोड़ा था। लेकिन एक दिन उन्होंने अपने आप से सवाल पूछा अगर मैं इस कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलता हूँ तो क्या होगा?

हजारों साल तक रोजमर्रा की जिंदगी एक बहुत बड़ा चैलेंज थी, जिंदा रहने के लिए बहुत स्ट्रगल करना पड़ता था। हमारे पूर्वजों ने अपनी जिंदगी का लगभग हर पल खाना और रहने की जगह ढूंढने भी गुजारा है। लेकिन ह्यूमन हिस्ट्री में यह हाल फिलहाल की बात है कि इंसान ने अपनी खुशियों और कंफर्ट को हल्के में लेना शुरू कर दिया है, जैसे कि परमानेंट फूड सप्लाई। इस बात में कोई शक नहीं है कि हमारी जिंदगी बहुत आसान हो गई है लेकिन जरूरी नहीं है कि कंफर्ट ज़ोन में रहने वाला खुश हो। असल में इंसान इस मॉडर्न लाइफस्टाइल में इतना डिप्रेस्ड और स्ट्रेस्ड है जितना कभी नहीं था। पहले के जमाने में जिंदगी जीने का फिजिकल स्ट्रेस आज के जमाने के मेंटल स्ट्रेस, एंजायटी और बर्नआउट से बदल चुका है। अपने आप को खाने, शराब और स्क्रीन टाइम में खो देने की कोशिश सिर्फ हमारे डिस्ट्रक्शंस को और बढ़ाती है।

हलांकि, हमारी बॉडी ही ऐसी है कि हम कंफर्ट की तलाश करते हैं लेकिन जरूरी नहीं है कि यह हमेशा अच्छा हो। कुछ ऑर्थोलॉजिस्ट का मानना है कि हम आज के कंपैरिजन में हजारों साल पहले बहुत खुश थे। हमारी बहुत आम सी जरूरतें हुआ करती थी जिन्हें बहुत आसानी से पूरा किया जा सकता था। हम नेचुरली माइंडफुल होते और प्रेजेंट मोमेंट भी जिया करते थे। जब लेखक को महसूस हुआ कि उनकी जिंदगी कुछ ज्यादा ही कंफर्टेबल है, तो उन्होने फैसला लिया कि अब उन्हें थोड़ा सा डिस्कंफर्ट का एक्सपीरियंस करना चाहिए। उन्होंने अपने आप को एक महीना अलास्का के जंगल में शिकार करते हुए गुजारने का चैलेंज दिया, जहां पर उन्हें टेंट में सोना होता था। वहां पर मॉडर्न जिंदगी का कोई भी कंफर्ट मौजूद नहीं था।

लेखक के लिये यह ट्रिप एक ट्रांसफोर्मेटिव एक्सपीरियंस था। कुछ दिनों के अंदर ही वह अपने आप को शांत, फिट और नेचर से कनेक्ट करता हुआ महसूस करने लगे थे। हो सकता है आर्कटिक अलास्का में कैंपेनिंग करना आपके लिए कोई वैकेशन आईडिया ना हो। लेकिन आगे हम ऐसे बहुत सारे सिंपल तरीकों के बारे में जानेंगे जिनकी मदद से आप डिसकंफर्ट के जरिए अपनी जिंदगी को बदल सकते हैं।

फिज़िकल चैलेंज और नए एक्सपीरियंस हमारी मेंटल हेल्थ को बेहतर करते हैं

एक होता है वॉक के लिए जाना और एक होता है वॉकअबाउट, वॉकअबाउट आदिवासी ऑस्ट्रेलियन का एक तरह का ट्रैडिशन है। इसके तहत यंग मेन 6 महीने तक 100 डिग्री फॉरेनहाइट टेंपरेचर का सामना करते हुए  ऑस्ट्रेलियन आउटबैक में घूमते हैं। इस चैलेंज में खाने और रहने की किल्लत के साथ ही दुनिया के सबसे खतरनाक सांप भी शामिल होते हैं। दुनिया की बहुत सारी कम्युनिटीज में ऐसे पासेज ट्रेजीशन हैं, ज़िंदनी के एक फेज़ से निकलकर दूसरे पेज में दाखिल होने के लिए की जाने वाली सेरेमनी। ऐसे मुश्किल चैलेंजेस का सामना करके, लोग बेहतर फिजिकल और मेंटल हेल्थ और अपनी बेहतर पहचान के साथ घर लौटते हैं।

वहीं दूसरी तरफ, बहुत सारे यंग अमेरिकंस को बिना किसी सुपरविजन के बाहर जाने की इजाजत नहीं है। फिक्रमंद मां-बाप अपने बच्चों की जिंदगी में आने वाली किसी भी मुश्किल को पहले ही हटा देते हैं और कोशिश करते हैं कि उन तक कोई मुश्किल पहुंचे ही ना। किसी भी तरह के चैलेंज हमें मजबूत बनाते हैं, और इस फिनॉमिना को ‘द टफनिंग थ्योरी’ कहते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ बुफालो के रिसर्चर्स ने अलग-अलग और बड़ी तादाद में अमेरिकंस पर रिसर्च किया कि क्या उनकी जिंदगी में प्यार, मौत का डर या कोई सीरियस बीमारी जैसी कोई कंडीशन आई है। उसके बाद रिसर्चर्स ने पार्टिसिपेंट की हेल्थ का अनलिसिस भी किया।

दिलचस्प बात यह है, कि जिन लोगों ने अपनी जिंदगी में उतार चढ़ाव देखे थे उनकी मेंटल हेल्थ और ओवरॉल सेटिस्फेक्शन लेवल बेहतर था। उनकी जिंदगी के मुश्किल एक्सपीरियंस ने उन्हें टफ बना दिया था, वह अपनी जिंदगी में आने वाले किसी भी नए चैलेंज के लिए तैयार नजर आ रहे थे।

यकीनन, पूरी तरह से नेगेटिव एक्सपीरियंस में जिंदगी गुजारना हमारे लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। लेकिन एक आरामदायक जिंदगी भी कुछ अच्छी नहीं है। हमें बैलेंस बनाने की जरूरत है। कुछ हद तक इसका मतलब नए एक्सपीरियंसेस और चैलेंजेज़ की तलाश में रहना, और अपना खुद का पासेज ट्रैडिशन बनाना है। लेखक को अलास्का पहुंचने से पहले ही इसके फायदे के बारे में मालूम हो गया था। उन्होंने इस ट्रिप की तैयारी करके अपनी यूजुअल रूटीन को बदला। उसी पुराने टीवी शो को देखने के बजाय उन्होंने सर्वाइवल स्किल्स सीखने और कैलोरी रिक्वायरमेंट के बारे में जानने का फैसला किया। नई स्किल सीखना और नई चीजों के बारे में सोचना ऑटो पायलट से निकलकर मेंटल एक्टिविटी ज़ोन में एंटर करने का सबसे बेहतर तरीका था। अपनी रूटीन बदलना और कोई नई स्किल सीखना अपने दिमाग को क्लियर करने के बस दो ही तरीके नहीं हैं। इसके अलावा आप कुछ और भी कर सकते हैं जो कि ज्यादा मुश्किल और अनकंफरटेबल है। क्या आप बोरियत और अकेलेपन के रास्ते पर चलने के लिये तैयार होंगे? बोरियत, अकेलेपन और नेचर के करीब वक्त गुजार कर, हम अपने आप को रिचार्ज कर सकते हैं।

अगर वह चिल्लाते तो उन्हें कोई सुन नहीं सकता था अगर वह बिना कपड़ों के नाचते भी तो उन्हें कोई देख नहीं सकता था। क्योंकि वह अलास्का के जंगल के बीच में एकदम अकेले थे। लेखक को वहां आजाद सा महसूस हो रहा था। कुछ घंटे वहां गुजारने के बाद लेखक सोचने लगे कि आज के जमाने में असल सॉलिट्यूड असल एकांत है।

कितना रेयर हो गया है। हम कभी भी अकेले नहीं होते। टेक्नोलॉजी की वजह से हम किसी न किसी शख़्स या चीज के लगातार कांटेक्ट में होते हैं। फिर भी लगभग 50% अमेरिकन का दावा है कि वह अकेले हैं। यहां तक कि इसे लोनलीनेस एपिडेमिक भी कहा जाता है। हालांकि, अजीब लग सकता है, लेकिन अकेलेपन का सामना करने का सबसे बेहतर तरीका अकेले रहना है। अगर आप खुद के साथ रहने में कंफर्टेबल हो जाएंगे तो इस अकेलेपन का डर खत्म हो जाएगा, इस पैंडमिक लॉकडाउन में भी। स्टडीज बताती हैं कि अकेले रहने के कई फायदे होते हैं, जैसे कि आपके अंदर क्रिएटिविटी बढ़ती है और आप ज्यादा एंपैथेटिक इंसान बनते हैं।

बोर होना फायदेमंद होता है खासतौर पर आपकी क्रिएटिविटी के लिए, लेकिन हम इस स्मार्टफोन पर इतना डिपेंडेंट हो गए हैं कि जरा सा भी बोर होना बर्दाश्त नहीं कर सकते। नतीजतन हम बर्न आउट हो जाते हैं और हमें मेंटल थकावट फैटीग से गुज़रना पड़ता है। बर्न आउट एक ऐसी सिचुएशन होती है जिसमें इंसान फिजिकली और मेंटली थका हुआ महसूस करता है। कभी-कभी कुछ ना करना हमारे दिमाग के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है। जिस तरह फोन रिचार्ज होता है उस तरह खुद को भी रिचार्ज करने के लिए, हमें यह स्मार्टफोन की स्क्रीन छोड़ नेचर में पेड़ पौधों को देखते हुए कुछ वक्त गुजारने की जरूरत है।

बहुत सारी स्टडीज बाहर वक्त गुजारने के फायदे बताती हैं। मिसाल के तौर पर, जापानियों में “फॉरेस्ट बाथिंग” का एक कॉन्सेप्ट है। जंगलों में बस 2 घंटे गुज़ारने से ही हमारी एंग्जायटी, स्ट्रेस और डिप्रेशन में बहुत कमी आ जाती है। खास बात यह है कि नेचर में वक्त गुज़ारने से दिल और किडनी की बीमारी वालों को भी फायदा होता है। किसी भी तरह का नेचुरल इन्वायरमेंट फायदेमंद होता है, लेकिन नेचर का असल फायदा जानने के लिए आपको जंगलों के आस पास जाना ही पड़ेगा। शहरी पार्क्स के मुकाबले वाइल्ड पार्क में वक्त गुजारने से एक अलग सा रिलैक्सेशन महसूस होता है, और इसका असर लंबा चलता है। एक UC बर्कली स्टडी में पाया गया कि अमेरिकन मिलिट्री वेटरन के 4 दिन राफ्टिंग ट्रिप पर गुजारने पर असर हफ्तों बाद तक रहा है, उनमें PSTD और स्ट्रेस लेवल काफी कम दिखा। वह खुश और शांत थे। नेचर में वक्त गुजारने से आपका दिमाग रिसेट हो जाता है, लेकिन बॉडी के दूसरे हिस्सों का क्या?

क्रेविंग और असल भूख के बीच फर्क कीजिए, और जानिए कि कभी-कभी भूखा रहना भी अच्छा है।

फैट डाइट कारगर नहीं हैं। जो लोग वजन कम करते हैं उनमें से 3% लोग ही इससे दूरी रख पाते हैं। कुछ प्रॉब्लम तो यह है कि हम अंदाजा नहीं लगा पाते कि हम कितना खाते हैं। यहां पर मिसाल के तौर पर 1992 में ओवरवेट लोगों पर की गई स्टडी से पता चलता है जिन लोगों को लगता था कि वह 1,000 कैलोरी के आसपास जंक फूड खाते हैं वह दरअसल इसके डबल खाया करते हैं। हमारे लिए कम खाना इतना मुश्किल क्यों है? एक बार फिर बात घुमा कर हमारे डिस्कंफर्ट पर ही आ जाती है, हम भूख बर्दाश्त या इग्नोर नहीं कर पाते। फूड क्रेविंग नॉर्मल है। मीठा खाने या कैलोरी से भरा स्नेक खाने की हमारी ख्वाहिश का एक इवल्यूशनरी मकसद है। सोचिए हजारों साल पहले हमारे पूर्वज कैसे रहते रहे होंगे। उस वक्त खाना आसानी से नहीं मिल पाता था इसलिए उन्हें अपने पेट में खाना प्रिजर्व करके रखना पड़ता था, मतलब हमारे पूर्वज थोड़ा सा ज्यादा खा लेते थे ताकि अगर अगले टाइम खाना ना मिले तो उनका काम चल सके। अच्छी बात है कि हमें इस बात की फिक्र करने की जरूरत नहीं है कि हमें अगला खाना मिलेगा या नहीं। लेकिन हमारी वह क्रेविंग बरकरार है हम अब पेट में खाना सेव करने के लिए नहीं बल्कि स्ट्रेस, आदत या बोरियत की वजह से ज्यादा खा लेते हैं। हम जितना खाते हैं उतना खाने की भूख होती नहीं है।

वजन कम करने का बहुत छोटा सा सिंपल सीक्रेट है, खाना कम खाइए और जब आप सच में भूखे हों तभी खाना खाइये। कोशिश कीजिए कि आप थोड़ी सी भूख लगते ही फौरन खाना खाने से बचें। मिसाल के तौर पर, अगर आप स्ट्रेस में है और आपका कुछ खास खाने का मन कर रहा है तो इसकी जगह वॉक पर जाना पसंद कीजिए। आपको जल्दी एहसास हो जाएगा कि आप सच में भूखे नहीं थे। थोड़े वक्त के लिए फास्ट रखना भी फायदेमंद होता है। ऑटोफगी (autophagy) एक ऐसा बायोलॉजिकल प्रोसेस है जो हमारे शरीर के अंदर से कमजोर सेल्स को निकाल देता है। अपने अंदर की गंदगी निकालने का यह बॉडी का अपना तरीका है, इसमें कैंसर अल्जाइमर और दूसरी बीमारियों से जुड़े सेल्स भी निकल जाते हैं। जब हम लगातार खाते रहते हैं तो हमारी बॉडी इस इंपॉर्टेंट प्रोसेस को अंजाम नहीं दे पाती। अलास्का में अपने कैंपिंग के दौरान लेखक ने थोड़ी भूख बर्दाश्त करने के डिसकंफर्ट से अपने आपको कंफर्टेबल कर लिया था। शुरुआत में यह काफी मुश्किल था, लेकिन वक्त के साथ उन्हें खाने की इंपोर्टेस का एहसास हुआ और अपनी नयी हैबिट और भूख के बारे में काफी कुछ पता चला। हालांकि अगले लाइफ लेसन के लिए उन्हें एकदम अलग जर्नी पर जाने की जरूरत पड़ी।

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मौत के बारे में सोचने और यह एक्सेप्ट करने से कि कुछ भी पर्मानेंट नहीं होता, हम ज्यादा खुशहाल और मीनिंगफुल जिंदगी गुजार सकते हैं

लेखक की जिंदगी अच्छी चल रही थी लेकिन एक दिन उन्होंने पोडकास्ट सुनते हुए कॉस्मिक कैलेंडर के बारे में जाना। यह कांसेप्ट 14 बिलियन साल के वजूद को एक साल में समेट देता है। 1 जनवरी की आधी रात को बिग बैंग हुआ। यह धरती सितंबर के महीने में वजूद में आई। 30 दिसंबर को डायनासोर्स गायब हो गए। और इंसान 31 दिसंबर 11:59 तक वजूद में नहीं आया था। जब लेखक ने यह बात सुनी तो वह परेशान हो गए। अचानक से वह अपनी मौत और इस दुनिया में अपनी कोई भी इंपॉर्टेंस ना होने के अहसास से घबरा गए। वह और उनके अपने जल्द ही मर जाएंगे यह एहसास लेखक को बहुत अनकंफरटेबल कर रहा था। वेस्टर्न कल्चर में हम मौत के बारे में सोचने से बचते हैं। जब हमारा कोई चला जाता है तो हमें बिजी रहने और उसके बारे में ना सोचने की सलाह दी जाती है। लेकिन ईस्टर्न हिमालय के भूटान नाम के देश में लोग मौत को दूसरे नजरिए से देखते हैं। इनफैक्ट, उन्हें दिन में कम से कम 3 बार अपनी मौत के बारे में सोचने के लिए इंकरेज किया जाता है। गुजर जाने वालों की राख से क्ले पिरामिड बनाया जाता है और उसे पब्लिक एरिया में रखा जाता है। आखिरकार, मौत जिंदगी का हिस्सा है। भूटान के दुनिया के सबसे खुशहाल देशों में एक होने के चलते लेखक की दिलचस्पी बढ़ी और उन्होंने वहां जाने का फैसला किया। अपने इस सफर में उन्होंने बुद्धिस्ट बिलीव के बारे में जाना और समझा कि अपनी मौत और जिंदगी के बदलते हुए नेचर के बारे में सोच कर हम ज्यादा खुश रह सकते हैं।

इसे समझने का दूसरा तरीका यह हो सकता है, कि मौत एक पहाड़ है और हर रोज हम किनारे की तरफ बढ़ रहे हैं। हम इससे भाग नहीं सकते इसलिए हमें मुकरना भी नहीं चाहिए। लेकिन हम स्लो और स्प्रिचुअल रास्ता चुनकर वहां तक पहुंचने का रास्ता बदल सकते हैं। जो चीज होनी ही है उसे डरने के बजाय हमें शुक्रगुजार हो, रियालिटी एक्सेप्ट कर, माइंडफुली जिंदगी गुजारनी चाहिए। मौत को लेकर अपना नजरिया बदलना आसान नहीं है। लेकिन अगर आप खुश रहना चाहते हैं तो उस पहाड़ के बारे में सोचिए और सोचिये कि कैसे आप अपनी जर्नी को बेहतर बना सकते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप मेंटली कोई चेक लिस्ट बना लें। किसी कामयाबी से ज्यादा इंपॉर्टेंट जिंदगी को लेकर आपका नजरिया है। खुशहाल और सेहतमंद जिंदगी के लिए, आपको बाहर, लोगों के साथ, वेट उठाकर एक्सरसाइज करना चाहिए।

शिकार में मुश्किल काम जानवर को मारना नहीं बल्कि उठाकर ले जाना है। अलास्का ट्रिप के दौरान एक बार लेखक को शिकार किये हुये कैरिबू के कुछ हिस्से को उठाकर ले जाना था। उनका पैक 100 पाउंड का था। जिसे ऊंचे पहाड़ की तरफ ले जाने में काफी मुश्किल हो रही थी। वह उनकी जिंदगी का सबसे लंबा और इंटेंस वर्कआउट था। हमें लगता है हम अपनी फिजिकल लिमिट के बारे में जानते हैं, लेकिन अक्सर हम अपने आप को कम आंक लेते हैं। स्टडीज़ से पता चलता है कि एक्सरसाइज से होने वाली थकान फिजिकल नहीं बल्कि साइक्लोजिकल होती है। हमारे शरीर में कहीं ज्यादा कुछ करने की कूव्वत है। सबसे पहले चलिए देखते हैं कि कितनी बुरी तरह से हमारी लाइफ स्टाइल बदल चुकी है। हमारे एंसेस्टर्स बहुत एक्टिव रहते थे। शिकारी दिन भर में कम से कम 25 मील दौड़ते थे। हमारे लिए यह मैरॉथन है उनके लिए यह “अपने डिनर का इंतजाम करना था।” अनकंफर्टेबल और

अनप्रिडिक्टेबल जिंदगी जीने का मतलब है कि हम बहुत ज्यादा कैलोरीज़ बर्न करेंगे। हमारी मॉडर्न जिंदगी एकदम इसके उलट है। 25% अमेरिकन किसी भी तरह की कोई फिजिकल एक्टिविटी नहीं करते, कुछ भी नहीं। लेकिन यह जिंदगी आइडियल जिंदगी नहीं है, और जहां तक हमारे बॉडी की बात है तब तो बिल्कुल भी नहीं। हमें पूरे दिन बैठने के लिए नहीं बनाया गया है। और स्क्रीन देखते हुए ट्रेडमिल पर दौड़ने के लिए भी नहीं बनाया गया था। यकीनन यह बैठे रहने से तो बेहतर है लेकिन एक्साइज करने के और भी बहुत सारे बेहतर और नेचुरल तरीके हैं। हम बाहर अपने दोस्तों के साथ फिजिकल वर्क करते हुए इवॉल्व हुए हैं। इस तरह की एक्सरसाइज ज्यादा फायदेमंद और मजेदार है। आखिरकार एक्सरसाइज का कॉग्नेटिव पहलू भी तो होता है। अगर हमारा दिमाग और बॉडी दोनों ही एक्टिव हैं, तो हमें एक्सरसाइज रूटीन का ज्यादा फायदा होता है। एक दूसरी चीज जो समझने की बात है वो ये कि इंसान नेचुरल कैरियर्स हैं मतलब वह नेचुरल तौर पर बोझ उठाने के लिए बने हैं। शुरुआती दौर में हमारे पूर्वज खाना और अपना सामान लेकर यहां वहां जाते रहते थे। हमारी हेल्थ के लिए इस तरह की एक्सरसाइज बहुत फायदेमंद है। वजन उठाना एक कार्डियो एक्सरसाइज है जो हमें मज़बूत बनाती है और 1 घंटे में 2000 कैलोरी बर्न करती है, लेकिन यह हम जो वेट उठाते हैं उस पर डिपेंड करता है। अगर आप कोई नया स्पोर्ट्स आजमाने की कोशिश कर रहे हैं, तो रकिंग ट्राई करके देखिए, एक ऐसी एक्टिविटी जिसमें वेट, आउटडोर एक्सर्साइज़ और सोशल एस्पेक्ट तीनों शामिल है। पार्टिसिपेंट्स वेट उठाकर रेकिंग करते हैं। यह थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन अकेले जिम करने से काफी फायदेमंद है।

अपनी पहले से बनी बनाई सोच को चैलेंज और नए एक्सपीरियंस की तलाश कीजिए

अपनी आदतों और अपने यकीन पर सवाल उठाना भी अनकंफरटेबल होता है। मिसाल के तौर पर हैंड वॉश करने को ही ले लीजिए कोविड से पहले भी हम लोग अगर बहुत ज्यादा नहीं तो रेगुलर तौर पर हैंडवाश करते ही थे। हम मानते हैं कि हाइजीन अच्छी हेल्थ प्रमोट करती है। तंजानिया में रहने वाले हादज़ा लोग मुश्किल से ही कभी हाथ या अपनी बॉडी धोते हैं, और जब धोते भी हैं तो कीचड़ से। उनके पास टॉयलेट नहीं होते। जब वह खाना बनाते हैं जो कि अक्सर कच्चा ही होता है, उनके हाथ गंदे होते हैं। आपको लग रहा होगा कि इन लोगों की सेहत अच्छी नहीं रहती होगी। लेकिन उनका यह अजीब रवैया, कम से कम वेस्टर्न स्टैंडर्ड के मुताबिक, उनकी अच्छी सेहत में भागीदार है, और उनके इम्यून सिस्टम को मजबूत रखता है। उनमें चिड़चिड़ापन, बोवेल सिंड्रोम और पेट का कैंसर नहीं पाया जाता, जोकि वेस्ट में बहुत हाई रेट में पाया जाता है। साइंटिस्ट्स अब सोचने लगे हैं, क्या सफाई को लेकर हमारा पागलपन हमारे लिए खतरनाक हो सकता है? हम हर चीज सेनेटाइज़ और साफ करते हैं, अपने शरीर का बाहरी हिस्सा साबुन से तो अंदरूनी हिस्सा एंटीबॉडीज़ से, कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ऐसा करके अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हमारी सफाई की आदत कुछ पुरानी बीमारियों और खाने से होने वाली एलर्जी को लेकर हमारी सेंसटिविटी को बताती हैं।

शायद सफाई को लेकर हादज़ा के रवैय्ये या दुनिया की दूसरी कल्चरल हैबिट और लाइफ स्टाइल से हम कुछ सीख सकते हैं। जापान और कोरिया की sea women का एग्जांपल लीजिए, मछली पकड़ने वाली ऐसी औरतें जो ठंडी नदी में बिना वेटसूट के कूद जाती हैं। एक स्टडी से पता चलता हैं।
कि इनमें सर्दी, दिल की बीमारी और गठिया होने के चांसेस से कम है, हैरत की बात है कि ठंड में रहना सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। याद रखिए यह सिर्फ फिज़िकल सेंसेशन की बात नहीं है नए एक्सपीरियंस के ज़रिये ही जिंदगी को अच्छी तरीके से जिया जा सकता है। जब लेखक अलास्का ट्रिप से वापस आए तो उन्हें अपने बारे में काफी ज्यादा नॉलेज हो चुकी थी अब वह जिंदगी को ज्यादा अप्रिशिएट करने लगे थे। नये और इंटेंस एक्सपीरियंस के जरिए आप भी ऐसा बदलाव हासिल कर सकते हैं।

जिंदगी को एक स्क्रैपबुक की तरह समझिये। अगर आप वही चीज देखते और करते रहेंगे तो किताब खाली रह जाएगी, और जिंदगी गुजरती रहती है। कोई ट्रिप या फिजिकल चैलेंज जैसा एक्साइटिंग एक्सपीरियंस आपके किताब को एक नया पेज देता है। तो क्या आप अपनी स्क्रैपबुक में कुछ जोड़ने के लिए तैयार हैं? हो सकता है, यह बहुत कंफर्टेबल ना हो। लेकिन मीनिंग फुल लाइफ बहुत कम ही कंफर्टेबल होती है।

 

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हमें लगता है कि मॉडर्न जिंदगी की सहूलियत से हमें खुश होना चाहिए, लेकिन अक्सर ऐसा होता नहीं है। खुशहाल और सेहतमंद जिंदगी जीने के लिए, हमें अपने पूर्वजों से इंस्पिरेशन लेकर, अपने कंफर्ट जोन से निकलने की जरूरत है। अगर आप अपनी रूटीन और लाइफस्टाइल से सेटिस्फाइड नहीं है तो यह वक्त है कि आप कोई नई लाइफस्टाइल चुने और अपने आपको फिजिकली चैलेंज करें।

अपने आसपास हरियाली रखिए
हो सकता है आपको जंगल में कैंपिंग करने का आईडिया अच्छा ना लगा हो लेकिन नेचर के आसपास गुजारा गया जरा सा भी वक्त आपके ऊपर बहुत पॉजिटिव असर डालता है। अगर आप शहर में रहते हैं तो पार्क में ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजारने की कोशिश कीजिए। या फिर अपने घर और ऑफिस में प्लांट रखिए, यह अपने मूड को ठीक करने का बहुत सिंपल तरीका है।

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