Me, Myself and Us

पर्सनालिटी का विज्ञान
आपने ये गाना तो जरूर सुना होगा “मैं ऐसा क्यों हूं, मैं जैसा हूं मैं वैसा क्यों हूं?” इसी गाने की तरह क्या आपके मन में कभी ये ख्याल नहीं आता कि आप जैसे हैं उसकी क्या वजह है? आपकी शख्सियत इस तरह कैसे ढल गई? हम तो दूसरों को देखकर भी ये सोचने लगते हैं कि फलाना ऐसा है तो आखिर इसकी क्या वजह है? ये किताब इसी सवाल का जवाब देती है। ये हमें “हम” और आपको “आप” बनाने वाली वजह के बारे बताती है। पर्सनालिटी किस तरह की होती है और कैसे बनती है, इन पर कौन से फैक्टर्स असर डालते हैं और ये हमारे बर्ताव को कैसे प्रभावित करती है इस पर पूरी डीटेल में बात की गई है।
लेखक
Dr. Brian Little, साइकोलॉजी के प्रोफेसर हैं जो Carleton, McGill, ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसी नामी यूनिवर्सिटीज में पढ़ा चुके हैं। वो पर्सनालिटी साइकोलॉजी के एक्सपर्ट हैं।
हमारी राय और बर्ताव हमारे अनुभवों से तय होते हैं
इस दुनिया में ऐसा कौन है जिसके दिमाग में एक बार भी ये ख्याल न आया हो कि आखिर इंसान जो बर्ताव करते हैं उसके पीछे क्या वजह होती है? आपको ये सवाल परेशान करता होगा कि आप इतना शर्माते हैं तो इस आदत को बदला कैसे जाए? आपको दोस्त बनाने में इतनी मुश्किल आती है तो इसे आसान कैसे किया जाए? हमेशा अकेले रहने वाले लोग ऐसा क्या करें कि उनके आसपास जमघट लग जाए? हो सकता है आपने ऑनलाइन कोई पर्सनालिटी टेस्ट भी लिया हो और इसके नतीजे देखने के बाद आपने सोचा हो कि इसमें कोई सच्चाई है भी या नहीं। ये किताब इसी तरह के सवालों पर और गहराई से बात करती है जिसमें पर्सनालिटी पर हो रही रिसर्च को ध्यान में रखकर ये समझाया गया है कि क्या हमारा बर्ताव और हमारी पर्सनालिटी तय है या फिर हम इसमें बदलाव ला सकते हैं।
हम सबने ये बात सुन रखी है कि “don’ t judge a book by its cover” फिर भी जब असल जिंदगी की बात आती है तो शायद ही कोई इसे याद रखता है। याद रह भी जाए तो भी इसे फॉलो करने में मुश्किल आती है। हम रोजाना कितनी बार लोगों के बारे में अपनी राय कायम कर लेते हैं वो भी first impression की बुनियाद पर। अच्छा मजे की बात ये है कि पहले इम्प्रेशन के भी अलग अलग वर्जन हो सकते हैं। मान लीजिए आपने रेस्टोरेंट में किसी ग्राहक को वेटर के साथ बदतमीजी से पेश आते देखा। आपको लगेगा कि इसकी जबान ही खराब है। लेकिन आप ये भी सोच सकते हैं कि हो सकता है आज किसी बात पर इसका मूड खराब हो वरना ये तो अच्छा इंसान लग रहा है। लेकिन ज्यादातर लोग पहले वाले version को ही सही समझते हैं क्योंकि इस नतीजे तक पहुंचना बहुत आसान है। जबकि इस बर्ताव के पीछे कोई वजह तलाश करने में दो चार मिनट ही सही पर वक्त तो लगता है। आप जिस भी तरह के version पर चलें जल्दबाजी फिर भी होती है और यहां objectiveness भी नहीं रहती क्योंकि ये हमारे अपने अनुभवों, धारणाओं और सोच पर बनते हैं। यानि इन पर personal constructs की छाप रहती है। ये शब्द “personal constructs” सबसे पहले साइकोलॉजिस्ट जॉर्ज कैली ने दिया था। इसे आप इमोशनल लेंस कह लीजिए जिससे लोग दुनिया को देखते हैं। हर इंसान के अपने personal constructs होते हैं। इसी वजह से आप या तो उस ग्राहक को बुरा समझते हैं या फिर बस ऐसा इंसान जो अपना गुस्सा किसी और पर उतार रहा है। किसी मुश्किल का सामना करना और उस दौरान आपका बर्ताव भी इन personal constructs के हिसाब से बदलता है। दुनिया को देखने का आपका नजरिया जितना छोटा होगा उतना ही किसी परेशानी का सामना करना मुश्किल होगा। खासतौर पर जब परेशानी आपके सामने एकदम से आ जाए। मान लीजिए आपका कोई दोस्त अपना ब्रेकअप भुला ही नहीं पा रहा। अगर वो हर इंसान को शक की नजर से देखने लगे और वफादारी से उसका भरोसा उठ जाए तो उसे आगे किसी से जुड़ने में बहुत मुश्किल होगी।
हमारी पर्सनालिटी के लिए 5 बातें मुख्य रूप से जिम्मेदार होती हैं
अगर आपने कभी कोई ऑनलाइन पर्सनालिटी टेस्ट दिया होगा तो देखा होगा कि ऐसे टेस्ट की भरमार है। लेकिन साइकोलॉजिस्ट Ten-Item Personality Inventory (TIPI) पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। ये टेस्ट इस थ्योरी पर बनाया गया है कि हमारी पर्सनालिटी में 5 चीजों का बड़ा योगदान होता है जिनको Big Five कहा जाता है। इनके आधार पर ही हम रिएक्ट करते हैं। इनमें पहला है conscientiousness यानि organized रहना, अपने लक्ष्यों पर ध्यान बनाए रखना और लगन । TIPI के हिसाब से जिन लोगों में conscientiousness का लेवल बहुत ऊपर होता है वो पढ़ाई और करियर दोनों जगह बहुत सफलता पाते हैं। उनको मेहनत के मायने पता होते हैं, वो अपनी डेडलाइन पूरी करते हैं और सोशल मीडिया जैसे किसी भी भटकाव से दूर रहना पसंद करते हैं। लेकिन पूरी तरह organized आप किसी जानी पहचानी जगह या हालात में ही रह सकते हैं। Conscientious लोगों को हर उस जगह या चीज में मुश्किल आती है जो सही तरह बंधी न हों जैसे जैज म्यूजिक। इस म्यूजिक का हर एक्सपर्ट जानता है कि क्रिएटिविटी को खुलकर बहने दिया जाए तो ये संगीत और निखारा जा सकता है। साइकोलॉजिस्ट अपनी स्टडीज में ये देखते हैं कि जिन लोगों में conscientiousness कम होता है उनके जैज को ज्यादा पसंद किया जाता है। ऐसे म्यूजिशियन जो नियम और स्ट्रक्चर से बांधकर संगीत तैयार करते हैं वो परेड और झांकियों के लिए ज्यादा सही रहते हैं।
Big Five में अगला नाम आता है agreeableness का यानि आप कितने दोस्ताना, खुशमिजाज, मददगार और करुणा से भरे इंसान हैं। रिसर्च ये कहती हैं कि agreeableness और कामयाबी का छत्तीस का आंकड़ा है। यानि जिन लोगों में ज्यादा agreeableness होती है उनकी तनख्वाह दूसरों के मुकाबले कम होती है। लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि दबंग या पत्थर दिल बनकर आप बहुत आगे निकल जाएंगे। Unfriendly रहना भी आपके कोई काम नहीं आएगा। इसलिए न तो बहुत कम और न ही बहुत ज्यादा agreeableness से काम लीजिए।
बिग फाइव की अगली तीन चीजें हैं Neuroticism, openness और extraversion
Neuroticism सुनने में बहुत बड़ा शब्द लगता है पर इसका मतलब बस इतना है कि कोई इंसान खतरों को कितनी जल्दी भांप लेता है। हमारे पूर्वजों ने इसे सदियों पहले डेवलप कर लिया था क्योंकि इस तरह वो खुद को तरह तरह के अनजाने खतरों से बचा सकते थे। फिर वो चाहे जंगली जानवर हों या बाढ़ और तूफान जैसी आहट। यानि neuroticism किसी भी तरह के “शिकारी” से बचने का हथियार था। लेकिन आज जब इस तरह के खतरे लगभग न के बराबर हैं तब ऐसी कोई आदत लोगों को बेमतलब की चिंता और परेशानी में डाल सकती है। इसलिए जिनमें neuroticism कम होता है वो ज्यादा स्टेबल और शांत रहते हैं। अगला नाम है openness का यानि कोई इंसान कितने खुले मन से नए सुझाव, विचार, जगह और लोगों का स्वागत कर पाता है। इसे आर्ट से अच्छी तरह जोड़ा जा सकता है। जो लोग openness से भरे होते हैं वो अक्सर संगीत, फिल्मों, घूमने फिरने और ऐसी हर चीज को एन्जॉय करते हैं जो उनकी जिज्ञासा को शांत करे। इसलिए सफलता के लिए भी openness मायने रखती है। खासतौर पर जिन चीजों में क्रिएटिविटी और कुछ नया करने की जरूरत हो। जबकि कम openness वाले लोगों के लिए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना भी मुश्किल होता है। बिग फाइव में आखिरी नाम है extraversion का। आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो बाहरी दुनिया की सच्चाई को अपनी अंदरूनी भावनाओं से ज्यादा महत्व देते हैं। Extraversion यही है। जैसे अपनी कार में जोर से गाने बजाकर दूसरों को अपने म्यूजिक का टेस्ट बताने वाला इंसान extravert हो सकता है। दोस्ती और कामकाज में extraverts ज्यादातर quantity को quality से ऊपर रखते हैं जबकि introverts इनसे बिल्कुल उल्टे होते हैं। इसलिए इन दोनों का एक साथ रहना या काम करना काफी मुश्किल हो सकता है। अब सोचकर देखिए कि किसी ऑफिस में दो extravert और introvert साथ हैं। उनको एक ही काम दिया जाता है कि वो कोई रिपोर्ट तैयार करें। इस बात के ज्यादा चांस हैं कि extravert उसे पहले पूरा कर देगा और काम भी ठीक ठाक होगा। जबकि introvert भले ही ज्यादा समय ले पर उसकी रिपोर्ट काफी डीटेल में बनी होगी।
बिग फाइव traits को बदलने में free traits मदद कर सकती हैं
हमारी जिंदगी में Big Five traits शुरुआत से आखिर तक लगभग वैसी ही बनी रहती है। जबकि free traits हर नए अनुभव के साथ बदलने लगती है। इससे पहले कि हम free traits का तरीका समझें हमें पर्सनालिटी बनाने वाली तीन बातों पर ध्यान देना होगा। इनमें से दो तो फिक्स रहती हैं जबकि तीसरी बदलती रहती है। यहां पहली है biogenic यानि जो हमारे जीन्स और ब्रेन का हिस्सा हैं। हम इसे लेकर ही पैदा होते हैं। इसका सबूत है कि नवजात बच्चों तक की भी पर्सनालिटी होती है। कुछ बच्चे तेज आवाज से खुश होते हैं जबकि कुछ परेशान हो जाते हैं। ये इस बात का इशारा भी करता है कि कौन सा बच्चा introvert बनेगा और कौन सा extravert. दूसरा सोर्स है sociogenic यानि आप जिस माहौल में पले और बढ़े हैं वहां से मिलने वाली सीख। पूर्वी एशिया के बच्चों को अपने दोस्तों, परिवार और समाज से घुल मिलकर रहना सिखाया जाता है जबकि अमेरिकन बच्चों को सबसे अलग रहना। तीसरा है idiogenic सोर्स जो बदला जा सकता है। ये तय करता है कि हम अपने दिन कैसे बिताना चाहते हैं। यानि मोबाइल, सोशल मीडिया और टीवी देखकर या फिर समाज या पर्यावरण की भलाई से जुड़ा काम करके। जब हम ऐसा कोई गोल चुनते हैं तो हम अपनी बंधी बंधाई शख्सियत से निकलकर free traits को चुनते हैं। ये free traits आपसे वो करवा सकते हैं जो आप वैसे कभी करने का सोचते भी नहीं। जैसे कोई introvert जो लोगों से बात करने से भी बचता हो वो भी स्टूडेंट्स के एक बड़े ग्रुप के सामने स्पीच दे सकता है अगर इससे उन बच्चों को कोई राह मिलती हो। Free traits हमें वो गोल पूरे करने में मदद करते हैं जो हमें meaningful लगते हों पर जब कभी वो आपके दूसरे जरूरी traits पर भारी पड़ने लगें तो मुश्किल बन सकते हैं। साइकोलॉजिस्ट ने अपनी रिसर्च में ये देखा है कि जो लोग अपनी पर्सनालिटी के किसी हिस्से को दबाकर रखते हैं उनकी सेहत खराब होने की संभावना ज्यादा होती है। जबकि खुलकर जीने वाले लोगों की इम्यूनिटी बेहतर होती है।
High self-monitor और low self-monitor लोग
कुछ लोग जहां भी हों हमेशा एक से नजर आते हैं जबकि कुछ लोग हालात और अपने आसापास के लोगों के हिसाब से पूरी तरह बदल जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप high self-monitor (HSM) हैं या फिर low self-monitor (LSM).
HSM लोगों पर अपने आसापास के माहौल का बहुत गहरा असर पड़ता है। उनके लिए ये बात बहुत मायने रखती है कि दूसरे उनके बारे में क्या सोचेंगे इसलिए वो दूसरों की उम्मीदों के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं। आपने किसी ऐसे इंसान को देखा होगा जो आज तो बड़ा बातूनी और चंचल नजर आता हो और कल बिल्कुल गुमसुम हो जाए। ऐसे लोगों को समझना मुश्किल होता है। जबकि LSM वालों को कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि उनके आसपास कोई क्या सोच रहा है। इसलिए वो अपने असली किरदार में बने रहते हैं। आपका कोई ऐसा LSM दोस्त होगा जो हल्के फुल्के या किसी गंभीर मौके पर एक सा रहता हो। वो जैसा है बस वैसा बना रहता है। कभी कभी लोग उसे कह भी देते होंगे कि तुम तो माहौल के हिसाब से टस से मस भी नहीं होते हो। आपका अपने पार्टनर के साथ रिश्ता भी इस बात पर काफी हद तक निर्भर करता है कि आप HSM में आते हैं या फिर LSM में। रिसर्च बताती हैं कि HSM किसी रिश्ते में रहते हुए पार्टनर के लुक्स और कपड़ों पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं जबकि LSM के लिए अपने पार्टनर की पर्सनालिटी ज्यादा मायने रखती है। इसलिए LSM के रिश्ते अक्सर ज्यादा मजबूत और लंबे टिकते हैं जबकि HSM इधर उधर भटकते हुए नए पार्टनर की खोज में लगे रहते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक साइकोलॉजिस्ट ने अपनी स्टडी में ये देखा कि HSM अक्सर मीट को चखने के बाद उसमें नमक डालना पसंद करते हैं क्योंकि उनको सबसे पहले मीट का असली स्वाद पता लगाना होता है। जबकि LSM खुद पर भरोसा रखते हुए अपने स्वाद के अनुसार नमक डालते हैं और इसके बाद इसे चखते हैं।

अगर सही तरह से संभाला जाए तो भ्रम आपके काम आ सकते हैं
अगर आपसे पूछा जाए कि अपनी जिंदगी पर आपका कितना काबू है तो आप क्या जवाब देंगे? पर्सनालिटी साइकोलॉजिस्ट कहते हैं कि इस सवाल के जवाब के लिए दो तरह के एटीट्यूड हो सकते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि उनका अपनी जिंदगी पर भरपूर कंट्रोल है और किस्मत या कर्मों का फल बहुत कम असर दिखाता है। जबकि बाकी लोग मानते हैं कि उनकी जिंदगी किसी बाहरी ताकत के हाथ में है जिसमें उनका कोई कंट्रोल नहीं है। खुद को ये यकीन दिलाना कि आपने जिंदगी को अपनी मुट्ठी में कर रखा है आपके दिल, दिमाग और सेहत को बेहतर बनाए रखता है। इसलिए जब कभी ओल्ड एज या नर्सिंग होम में रहने वाले लोगों को अपना रूटीन खुद बनाने का मौका दिया जाता है तो वो ज्यादा खुश और सेहतमंद नजर आते हैं। वो दूसरों से ज्यादा जी भी पाते हैं। लेकिन जहां इस बात का भ्रम हो कि जिंदगी हमारी मुट्ठी में है तो क्या किया जाए? क्या यहां भी वो इंसान वैसे ही खुश रह सकता है? हर इंसान को अपने बारे में कोई न कोई अच्छा या कह लीजिए कि पॉजिटिव भ्रम होता है। कई लोग मानते हैं कि उनका sense of humor किसी आम इंसान से ज्यादा अच्छा है। जबकि डेटा ये बताता है कि इतने लोगों का ह्यूमर एवरेज से ऊपर लेवल पर होना नामुमकिन है। अब भले ही उनकी खुद को लेकर ये सोच गलत भी हो पर ये उनके दिमाग को खुश और शांत रखने में काफी काम आती है। डिप्रेशन के मरीजों का सोचकर देखिए। इसकी एक बड़ी वजह होती है ये समझ लेना कि हमारा अपनी जिंदगी पर कोई काबू नहीं रहा। जबकि ये मानना कि हमारी मुट्ठी में आज भी अपनी जिंदगी की ताकत है हमें डिप्रेशन से दूर रखता है। पर अब ऐसा भी न हो कि आप अपने हर भ्रम को पालने पोसने लगें। इनकी सही टाइमिंग सबसे ज्यादा जरूरी है। काम या पार्टनर जैसे जरूरी फैसले लेते हुए illusions में रहना बहुत गलत साबित हो सकता है। इसलिए बेहतर यही होगा कि ऐसे मौकों पर सच्चाई और लॉजिक को ध्यान में रखा जाए। जब आपको नौकरी या पार्टनर मिल जाए तब सकारात्मक नजरिया आपसे हर नेगेटिविटी को दूर रखेगा। अगर आप ये मानने लगते हैं कि सब अच्छा होगा तो असलियत में भी सब अच्छा होने लगता है।
आप तनाव का सामना कैसे करते हैं ये भी आपकी पर्सनालिटी पर निर्भर करता है
साइकोलॉजिस्ट मानते हैं कि तनाव तब होता है जब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में एकदम कोई बदलाव आ जाए। लोग इन पर अपनी पर्सनालिटी के हिसाब से रिएक्ट करते हैं। कोई इंसान कितनी अच्छी तरह स्ट्रेस हैंडल कर सकता है ये उसकी hardiness पर निर्भर करता है जो तीन चीजों commitment, कंट्रोल और चैलेंज से बनती है। 1970s के दौरान रिसर्चर्स ने एक ऐसी कंपनी के स्टाफ की स्टडी की जिसमें अचानक काफी बदलाव आए थे। मैनेजमेंट बदल गया था, काम के घंटे बदल गए थे और माहौल भी। रिसर्चर्स देखना चाहते थे कि ये लोग किस तरह स्ट्रेस को हैंडल करते हैं। जिन लोगों में ये तीन C यानि commitment, कंट्रोल और चैलेंज का लेवल ज्यादा था वो दूसरों से अच्छी तरह स्ट्रेस हैंडल कर पाए। वो अपनी रोजाना की जिंदगी के हिसाब से चलते रहे भले ही हालात कितने बुरे क्यों न हो गए हों। वो ये भी मानते थे कि बदले हुए हालात भी उनके काबू में हैं इसलिए खुद को बेबस और लाचार नहीं समझते थे। उन्होंने बदलाव की शक्ल में आए चैलेंज का भी खुले दिल से स्वागत किया। उनको ये किसी सुनहरे मौके की तरह लगा न कि चुनौती की तरह। हालांकि ये गुण हद से बढ़ जाएं तो नुकसान भी कर सकते हैं। जिनके सिर पर commitment, कंट्रोल और चैलेंज भूत की तरह सवार हो उनको तरह तरह की बीमारियों और खास तौर पर दिल की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। जैसे कि टाइप A पर्सनालिटी वाले लोगों के ambitions भले ही बहुत ऊंचे रहते हों और वो हमेशा अच्छी से अच्छी परफार्मेंस देते हों पर इन तीन C में जकड़े रहना इनका नुकसान कर सकता है। जब कभी इनको अपना कंट्रोल छोड़ना या ढीला करना पड़ता है तब इनकी self- esteem पर आंच आ जाती है। ये अपने काम में इतना डूब जाते हैं कि इनको बाकी कुछ याद नहीं रहता या फिर ये सामने वाले को कुछ भी करके हराने और पछाड़ने में लग जाते हैं। इस वजह से इन लोगों को बीपी और दिल की बीमारियां घेर सकती हैं। यानि ये तीन C फायदेमंद भी हो सकते हैं और नुकसानदायक भी। इसलिए बेहतर होगा कि कभी भी aggression में न फंसें जो टाइप A वाले लोग अक्सर कर देते हैं। जब आपको commitment, कंट्रोल और चैलेंज का सही बैलेंस मिल जाता है तो आप इनका बेहतर फायदा उठा सकते हैं।