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I've Been Thinking

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Tips to live a Meaningful life

किताब “I’ve Been Thinking (2018) “में थॉट्स, प्रेयर्स, कोट्स के कलेक्शन हैं. ये किताब सभी के लिए है. भले ही आप जवान हों या फिर बूढ़े. स्टूडेंट हों या फिर काम क़ाज़ी. ये किताब हर उस इंसान के लिए है. जिसे अपने डेली लाइफ को बेहतर बनाना है.
ये किताब किसके लिए है?

लेखक

Maria Shriver एक पत्रकार होने के साथ-साथ न्यूज़ एंकर भी हैं. इन्होने अपने करियर में कई सारी किताबों का लेखन किया है.

अगर अभी पॉज की ज़रूरत है तो पॉज दीजिये, जीवन को एक नयी दिशा देने की कोशिश करिए

क्या आपको पता है कि आप कौन हो? क्या आपको पता है कि आप यहाँ पर क्यों हो? आपको काम क्यों करना है? अगर नहीं पता है. तो कोई बात नहीं है.

इस बात में कोई दिक्कत नहीं है कि अभी आपको इन सवालों का जवाब नहीं मालूम है. लेकिन अगर इन सवालों का जवाब आपको आगे भी नहीं मालूम होता है. तो उसमे दिक्कत है. ये सवाल आपकी जिंदगी के लिए बहुत ज्यादा ज़रूरी हैं. इसलिए लाइफ को एक सही दिशा देने के लिए इन सवालों के जवाब खुद से तलाश करने की कोशिश करिए.

इस किताब के अध्याय आपकी मदद करेंगे. ये आपको जानने में मदद करेंगे कि लाइफ का असली मतलब क्या होता है?

लोगों का सोशल मीडिया देखिये, कितना परफेक्ट नज़र आता है? लेकिन इस जहाँ में कोई भी परफेक्ट जिंदगी नहीं जी रहा है. तो फिर क्या लोग सोशल मीडिया पर गलत दिखावा कर रहे हैं. हो सकता है. इस पर हमें बहस करने की ज़रूरत नहीं है.

प्रॉब्लम ये नहीं है कि जिंदगी परफेक्ट नहीं है. प्रॉब्लम तो ये है कि हमें इससे दिक्कत होने लगती है कि हमारी जिंदगी परफेक्ट नहीं है. हमारा मानसिक संतुलन खराब होने लगता है. हमें कई तरह की बीमारियाँ होने लगती हैं.

मेन चीज़ ये है कि हमारे साथ जो कुछ भी हो चुका है. हम उसे बदल नहीं सकते हैं. ये सच्चाई है. इस पर लेखिका कहती हैं कि जिन चीज़ों को हम बदल नहीं सकते हैं. उनके प्रति हमें हमारी सोच को ही बदल देना चाहिए. जितनी जल्दी आप अपनी सोच को बदल देंगे. आप महसूस करने लगेंगे कि लाइफ में कई चीजें बदल रहीं हैं.

यहाँ मुख्य सन्देश ये है कि कई बार लाइफ को हमें कुछ समय के लिए पॉज भी कर देना चाहिए. क्या पता हमारे जीवन को कुछ रिफ्लेक्शन की ज़रूरत हो. ऐसा करने से हमें नयी राह भी मिल जाती है.

चीज़ों को लेकर अपने सोचने का तरीका बदलिए, जब आप सोच बदलते हैं. तब कई चीजें बदलने लगती हैं. जब आपके आस-पास चीजें बदलेंगी तो आपको खुद भी एहसास होगा.

ये भी सच है कि इस तरह के बदलाव में समय लगेगा. ये समय काफी ज्यादा भी हो सकता है. इसलिए पेशंस बनाकर रखियेगा. आपके अंदर का धैर्य ही आपको विजय पथ की ओर लेकर जाएगा.

खुद से पूछिए कि इससे पहले कब आपने खुद को कोई गिफ्ट दिया था? कब दिया था? क्या आप खुद को तोहफा देना चाहते हैं? अगर हाँ तो आज ही अपने जीवन को थोड़ा सा स्लो करने की कोशिश करिए. यही आपका सबसे बड़ा गिफ्ट होगा.

जब आप अपनी लाइफ को स्लो करेंगे तब आप अपने आस- पास की सुन्दरता को देख पायेंगे. तब जाकर आपको पता चलेगा कि लाइफ में बस भागना ही सब कुछ नहीं होता है. अगर हम स्लो होते हैं तो भी हम बहुत कुछ नया पा सकते हैं.

जब आप ऐसा करेंगे तो आपको पता चलेगा कि आपकी बिजी में जिन्दगी में बहुत सी ऐसी चीजें थीं. जिनकी आपको ज़रूरत नहीं है. या फिर वो सब चीजें वैसी नहीं हैं जैसी वो दिखती हैं. इसलिए खुद के लिए एक बेहतरीन तोहफा तैयार करिए.

जब आप जिंदगी को थोड़ा सा पॉज करेंगे तो आपको पता चलेगा कि अपने जीवन साथी के प्रति जो आपका गुस्सा था वो असल में किसी अलग ही घटना को लेकर था. इसी के साथ कई छोटी-बड़ी चीजों के बारे में आपको बेहतर तरीके से पता चलेगा.

इस एक्सपेरिमेंट को करने से आपका एक नज़रिया डेवलप होगा. उस नज़रिए से आपकी ही लाइफ में खुशियों की एंट्री होगी.

साथ ही साथ आपको ये भी पता चल सकता है कि आपकी ख़ुशी सिर्फ आपके पास ही है. अपनी खुशियों के लिए आपको किसी के भी सामने हाँथ फैलाने की ज़रूरत नहीं है. अगर ज़रूरत है तो बस खुद की काबिलियत को पहचानने की.

इस अध्याय से आपको ये सीख मिलती है कि जब कभी भी आप किसी भी फैसले में अटकें तो एक बार खुद को पॉज करके कुछ सवाल पूछ लीजियेगा. ये सवाल होंगे कि क्या ये फैसला अभी करना ज़रूरी है? मैं आज इस सिचुएशन से परेशान हूँ. क्या अगले 2 साल बाद भी ये मुझे इफ़ेक्ट करेगी?

इस तरह के सवालों से आप खुद को बेहतर समझ सकते हैं. खुद को समझने के साथ ही आप उस सिचुएशन को भी समझेंगे कि इसके लिए मैं क्यों परेशान हो रहा हूँ? ये तो इतनी बड़ी दिक्कत ही नहीं है. जितनी बड़ी दिक्कत मैंने इसे बना दिया है.

याद रखिये कि आप सिचुएशन के लिए नहीं बने हैं. बल्कि सिचुएशन आपके लिए बनी हुई हैं. इसलिए हमेशा अपनी सिचुएशन को बड़ी समझदारी से हैंडल करने की कोशिश करिए. जितनी समझदारी आप दिखायेंगे. उतना ही दिमाग आपका सुकून से रहेगा.

इसी के साथ कैसी प्रॉब्लम आपके पास आती है. उससे आपकी पहचान नहीं होती है. आपकी पहचान होती है कि आपने उस दिक्कत से सामना कैसे किया है? क्या आपने उस दिक्कत को हिम्मत के साथ दूर भगाया है. या फिर दिक्कत के सामने आपने पीठ दिखा दी है. जो भी हो. प्रोब्लेम्स से ही आप की पर्सनालिटी निखरती है.

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प्रेयर और मैडिटेशन के महत्व को समझ लीजिये

लेखिका बताती हैं कि उनका बचपन एक कैथोलिक फैमिली में बीता है. बचपन से ही उनके आस-पास काफी ज्यादा प्रेयर्स और अध्यात्म के ऊपर ध्यान दिया जाता था. वो बचपन से ही डेली प्रेयर किया करती थी.

वो बताती हैं कि प्रेयर ने उनको इतनी शांति दी है कि वो आज के समय में भी रोज़ प्रेयर करती हैं.

इस अध्याय के माध्यम से लेखिका बताना चाहती हैं कि प्रेयर, मैडिटेशन से आपको अंदर से शान्ति और सुख की प्राप्ति होती है.

प्रेयर बस विश्वास का ही तरीका नहीं है. बल्कि इससे इंसान खुद की आत्मा से कनेक्ट हो पाता है. अगर आपको भी खुदे के इनर सोल से मिलना है तो मैडिटेशन या फिर प्रेयर आपकी ज़रूर मदद कर सकती है.

अपनी प्रार्थनाओं में, मारिया अक्सर भगवान से मदद, मार्गदर्शन, आशा मांगती है. अपने लिए माफ़ी और अपने परिवार, समुदाय और देश के लिए स्वास्थ्य, खुशी और समृद्धि की कामना करती हैं.

लेखिका बताती हैं कि प्रेयर करने से आपके फैसले लेने की क्षमता भी बढ़ती है. उदाहरण के लिए लेखिका बताती हैं कि प्रेयर से ही आपके आज़ादी का रास्ता भी खुलता है. इसी के साथ लेखिका ये भी बताती हैं कि प्रेयर को बस आप किसी भी धर्म से मत जोड़ दीजियेगा.

प्रेयर का मतलब होता है. खुद को एक सुप्रीम पॉवर से कनेक्ट करना. जब आप खुद को उस पॉवर से कनेक्ट करेंगे. तो फिर आपको बदलाव भी खुद ही नज़र आने लगेगा. इससे आपके मन को शांति मिलेगी. दिमाग को एक नई पॉजिटिव उर्जा मिलेगी.

कई लोगों को ऐसा लगता है कि अपने आप को भगवान को सौपने का मतलब होता है कि आप कमजोर हो गये हैं. लेकिन अगर आप होगा. उस नज़रिए से आपकी ही लाइफ में खुशियों की एंट्री होगी.

साथ ही साथ आपको ये भी पता चल सकता है कि आपकी ख़ुशी सिर्फ आपके पास ही है. अपनी खुशियों के लिए आपको किसी के भी सामने हाँथ फैलाने की ज़रूरत नहीं है. अगर ज़रूरत है तो बस खुद की काबिलियत को पहचानने की.

इस अध्याय से आपको ये सीख मिलती है कि जब कभी भी आप किसी भी फैसले में अटकें तो एक बार खुद को पॉज करके कुछ सवाल पूछ लीजियेगा. ये सवाल होंगे कि क्या ये फैसला अभी करना ज़रूरी है? मैं आज इस सिचुएशन से परेशान हूँ. क्या अगले 2 साल बाद भी ये मुझे इफ़ेक्ट करेगी?

इस तरह के सवालों से आप खुद को बेहतर समझ सकते हैं. खुद को समझने के साथ ही आप उस सिचुएशन को भी समझेंगे कि इसके लिए मैं क्यों परेशान हो रहा हूँ? ये तो इतनी बड़ी दिक्कत ही नहीं है. जितनी बड़ी दिक्कत मैंने इसे बना दिया है.

याद रखिये कि आप सिचुएशन के लिए नहीं बने हैं. बल्कि सिचुएशन आपके लिए बनी हुई हैं. इसलिए हमेशा अपनी सिचुएशन को बड़ी समझदारी से हैंडल करने की कोशिश करिए. जितनी समझदारी आप दिखायेंगे. उतना ही दिमाग आपका सुकून से रहेगा.

इसी के साथ कैसी प्रॉब्लम आपके पास आती है. उससे आपकी पहचान नहीं होती है. आपकी पहचान होती है कि आपने उस दिक्कत से सामना कैसे किया है? क्या आपने उस दिक्कत को हिम्मत के साथ दूर भगाया है. या फिर दिक्कत के सामने आपने पीठ दिखा दी है. जो भी हो. प्रोब्लेम्स से ही आप की पर्सनालिटी निखरती है.

अपने अंदर लीडरशिप क्वालिटी को जन्म दीजिये

इस अध्याय में लेखिका ने माँ के ऊपर भी बात की है. सबका ध्यान खींचते हुए लेखिका बताती हैं कि कई महिलाओं से पूछो कि वो क्या करती हैं? तो उनकी तरफ से एक सामान्य सा जवाब आता है. वो जवाब होता है कि वो बस एक माँ हैं.

यहाँ मतलब ये है कि लोग माँ होने को कोई काम ही नहीं समझते हैं. इसके बाद वो अपने जीवन के अलग-अलग अचीवमेंट की लिस्ट बताते हैं.

इस अध्याय के माध्यम से लेखिका बताना चाहती हैं कि माँ होना भी एक फुल टाइम अचीवमेंट ही है. इससे आपके अंदर एक लीडरशिप क्वालिटी का जन्म होता है. उसी लीडरशिप की वजह से आपके अंदर एक लीडर का जन्म होता है.

मुख्य सन्देश ये है कि माँ होने में ही लीडरशिप है. जिसकी पूरी सोसाइटी को बहुत ज्यादा ज़रूरत है.

लेखिका यहाँ अपनी लाइफ का किस्सा शेयर करते हुए बताती हैं कि उन्हें उनकी माँ ने पाल पोसकर बड़ा किया है. उन्होंने देखा है कि उनकी माँ के अंदर कैसी अद्भुत प्रतिभा थी. वैसी प्रतिभा किसी भी आम इंसान के अंदर मुमकिन नहीं है. वो बस एक माँ के अंदर ही हो सकती है.

इसी के साथ लेखिका बताती हैं कि एक अच्छी माँ बहुत अच्छी लीडर भी हो सकती है. माँ की दयालुता को उसकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए. ये समाज के लिए एक गहने की तरह होता है.

इसी के साथ इस किताब में लेखिका ने ये सवाल भी उठाया है कि क्या हो अगर हम बिजनेस को या पॉलिटिक्स को माँ के नेचर से बढ़ने दें? क्या हो अगर हम आज के दौर के पुरुषों को बोले कि वो माँ के स्वाभाव से कुछ सीख कर आयें? जिस तरह माँ का रिश्ता बस माँ तक सीमित नहीं है. उसी तरह परिवार का मतलब भी बस खून के रिश्ते नहीं होते हैं. मारिया को इस बात का एहसास तब हुआ जब उनका बेटा कॉलेज की पढ़ाई के लिए बाहर गया.

कुछ दिनों तक मारिया को बहुत अकेलापन लग रहा था. लेकिन फिर मारिया ने प्रेयर किया. इसके बाद उन्होंने खुद को समझाया कि जिस तरह मेरी ममता औरों के लिए भी है. उसी तरह औरों का साथ भी मेरे लिए भी है. इसके बाद से कभी भी मारिया को अकेलापन नहीं हुआ. उन्हें पता चल गया कि समाज और दोस्त भी परिवार का ही हिस्सा होते हैं.

इस अध्याय का सार यही है कि अपने परिवार, समाज और दोस्तों का ख्याल रखिये.

अब सवाल ये उठता है कि मारिया ऐसा क्या करती थी? आपको बता दें कि बेटे के जाने के बाद. मरिया हर संडे को एक डिनर का आयोजन करती थीं. उस आयोजन में वो अपने ख़ास लोगों को इनवाईट करती थीं.

वो अपने गेस्ट के साथ खूब सारी बातें किया करती थीं. उनकी जिंदगी के कोनों में अब खुशियों का वास हो चुका था. इस तरह से मारिया को ये भी एहसास हुआ था कि लोगों से जुड़ाव में ही जिंदगी का असली रस छुपा हुआ है.

अगर हमें सही मायनें में जीवन का आनन्द लेना है तो फिर हमें अपने समाज और दोस्तों से खुद को कनेक्ट करना पड़ेगा. इस कनेक्शन का ये मतलब नहीं है कि आप बस ऑनलाइन ही अपने दोस्तों से कनेक्ट रहें. इसका मतलब ये भी हैं कि आपको उनसे मिलने के लिए समय निकालना ही पड़ेगा.

जब आप अपने आस-पास के लोगों से मिलते हैं. तो आप उनसे कई कहानियों को शेयर भी करते हैं. उनकी कहानियों को सुनते भी हैं. आसान शब्दों में कहें तो आप एक जिंदगी अपने दोस्तों के साथ शेयर करते हैं.

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दुःख डर से आता है और डर को बहुत दिनों तक अपने पास रहने मत दीजिये

इंसान को बस अपने बच्चों से ही दूर जाने में दुःख नहीं होता है. बल्कि इन्सान को हर उस चीज़ से बिछड़ने में दुःख होता है. जिससे उसका लगाव होता है. वो भले ही कोई जगह हो या फिर कोई रिश्ता. हर चीज़ के छूट जाने का डर इंसान के अंदर बैठा हुआ है. उसी डर के कारण वो जिंदगी को जीना ही भूल जाता है.

सबसे पहले आपको ये समझना पड़ेगा कि डर कहीं नहीं जाने वाला है. डर इंसानी फितरत होती है. वो आपके साथ ही रहेगा. अब ये आपके ऊपर है कि आप उसे हैंडल कैसे करते हैं? क्या आपको डर को मैनेज करना आता है?

अगर आपने डर को मैनेज कर लिया तो आपने अपने दुःख को भी मैनेज कर लिया. इस अध्याय का सार यही है कि किसी के जाने का दुःख मिटने में समय लगता है, और ये एक पर्सनल प्रोसेस होती है.

लेकिन किसी के जाने के दुःख को खुद के ऊपर इतना हावी नहीं होने देना है कि उससे आपकी जिंदगी ही खत्म हो जाए.

एक सवाल यहां आपसे पूछना बहुत ज़रूरी है. वो सवाल ये है कि क्या इस दुनिया में सभी चीजें बहुत अच्छी हैं? इस सवाल का जवाब है कि नहीं. इस दुनिया में कुछ चीजें खराब भी हैं. अब एक और सवाल खुद से करिए कि क्या आप खुश हैं? अगर इसका जवाब आपको मिले कि आप खुश नहीं हैं. तो इसके पीछे का रीजन क्या है?

अगर हमारे दुखी होने का कारण बीमारी है या फिर कोई घटना है. तो हमें उसके पीछे छुपे हुए डर को भी देखने की कोशिश करनी चाहिए. आज के दौर में कुछ ऐसा होने लगा है कि हम अपने ऊपर डर को कुछ ज्यादा ही हावी होने देते हैं.

डर की शुरुआत कहां से होती है? कई बार तो इस डर की शुरुआत सोसाइटी से होती है. ये हालात खराब तब हो जाते हैं. जब इस डर की शुरुआत बचपन से होने लगती हैं. बच्चे को स्कूल में ही ग्रेड्स का डर होता है. उसके अंदर ये भी डर होता है कि अगर मैंने अच्छा नहीं किया तो मेरे साथ ये होगा.

अगर आप किसी के जाने से अभी दुखी हैं. और आप ओके नहीं भी हैं. तो समझ लीजिये कि “इट्स ओके टू बी नॉट ओके”.

हमें जिंदगी में कई तरह के एक्सपीरियंस होते हैं. कई अच्छे होते हैं. तो कई बहुत ज्यादा बुरे होते हैं. कई बार हम सफल हो जाते हैं. तो कई बार हम बुरी तरह से फ्लॉप होते हैं. लेकिन हर एक अनुभव से हमें सीख ज़रूर मिलती हैं. अच्छे अनुभव से ख़ुशी और ज्यादा मेहनत की प्रेरणा मिलती है.

वहीं अगर हमको कुछ बुरा अनुभव हुआ हो तो हमें सीखना चाहिए कि आगे हमें क्या नहीं करना है. इसी के साथ हमें इस बात का ख्याल भी रखना चाहिए कि जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से नहीं होगा.

कई ऐसे मौके आयेंगे जब लोग हमको धोखा देकर चले जायेंगे. उस समय हमें खुद के साथ खड़े रहना है. खुद को हौसला देना है. गलती से भी अपने दिमाग में कभी भी किसी के लिए भी बदले की भावना को नहीं आने देना है.

प्रेयर करना है और सब सुप्रीम शक्ति के हाथों में सौंप देना है. याद रखना है कि उसका दरवाजे में आपको न्याय ज़रूर मिलेगा. इसी के साथ ये भी ध्यान रखना है कि हर दुःख के दरवाज़े के पीछे ही सुख खड़ा हुआ होता है.

इस अध्याय का मुख्य सन्देश यही है कि हमेशा खुद की बिलीफ को चैलेन्ज करते रहना है.

साइकोलोजिस्ट कार्ल जंग मानते हैं कि इस दुनिया में सभी लोग एक ही तरह के दिमाग से कनेक्ट हैं. कार्ल जंग ये कहते हैं कि ये हम सब

वहीं अगर हमको कुछ बुरा अनुभव हुआ हो तो हमें सीखना चाहिए कि आगे हमें क्या नहीं करना है. इसी के साथ हमें इस बात का ख्याल भी रखना चाहिए कि जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से नहीं होगा.

कई ऐसे मौके आयेंगे जब लोग हमको धोखा देकर चले जायेंगे. उस समय हमें खुद के साथ खड़े रहना है. खुद को हौसला देना है. गलती से भी अपने दिमाग में कभी भी किसी के लिए भी बदले की भावना को नहीं आने देना है.

प्रेयर करना है और सब सुप्रीम शक्ति के हाथों में सौंप देना है. याद रखना है कि उसका दरवाजे में आपको न्याय ज़रूर मिलेगा. इसी के साथ ये भी ध्यान रखना है कि हर दुःख के दरवाज़े के पीछे ही सुख खड़ा हुआ होता है.

इस अध्याय का मुख्य सन्देश यही है कि हमेशा खुद की बिलीफ को चैलेन्ज करते रहना है.

साइकोलोजिस्ट कार्ल जंग मानते हैं कि इस दुनिया में सभी लोग एक ही तरह के दिमाग से कनेक्ट हैं. कार्ल जंग ये कहते हैं कि ये हम सब लोगों की गलत फहमी है कि हम सब अलग-अलग हैं. उनके हिसाब से इस दुनिया में कोई एक शक्ति ही निवास कर रही है. बस शरीर अलग-अलग हैं.

आज के समय के लोग खुद को शरीर समझने लगे हैं. इसलिए वो अवसाद में भी जाते हैं और दुखी भी रहते हैं. बल्कि हमें खुद को आत्मा से कनेक्ट करना चाहिए. हम शरीर बस नहीं हैं. शरीर तो एक बहुत छोटी चीज़ है. जो कि आज तो हमारे पास है लेकिन कल इसे राख हो जाना है. इसलिए अब समय आ गया है. जब आप गॉड की शक्ति को पहचानिए.

इसलिए हमें लाइफ में प्रेयर और मेडिटेशन के महत्त्व को समझना चाहिए.

जिंदगी में हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम एक मीनिंगफुल जिंदगी को जियें. इसके लिए हमें सुप्रीम पॉवर के प्रति सम्मान और निष्ठा रखनी चाहिए. प्रेयर और मेडिटेशन के महत्व को समझना चाहिए. खुद को खुद से कनेक्ट करिए. अपने आस-पास के लोगों का ख्याल रखिये. परिवार को बस खून के रिश्तों में मत ढूँढने की कोशिश करिए. परिवार हर किसी के अंदर है. देर है तो बस उसे समझने की, खुशियों को बांटते रहिये.

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