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DOLLARS AND SEX

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प्यार और सेक्स को पैसा किस तरह प्रभावित करता है

डॉलर्स एण्ड सेक्स (2013) नाम की यह किताब सेक्स और लव से जुड़े जटिल मुद्दों को सिर्फ हार्मोन्स और कल्चरल पहलुओं की नजर से नहीं देखती है बल्कि दुनिया के ज्यादातर सेक्शुअल ट्रेंड्स के पीछे के वास्तविक कारण “ईकनामिक्स” यानि पैसे को भी इक्स्प्लोर करती है। सिम्पल ईकनामिक्स थ्योरीस के जरिए हम रोमांस करने के पीछे छुपी वजहों को समझेंगे और जानेंगे कि आजकल की इस मॉडर्न दुनिया में रिश्ते इतने कमजोर क्यूँ हो गए हैं।

Marina Adshade

पीएचडी कर चुकी डॉ. मरीना ऐडशेड यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया के स्कूल ऑफ ईकनामिक्स में पढ़ाती हैं। मरीना नियमित तौर पर ‘ग्लोब’ और ‘मेल’ जैसी पत्रिकाओं के लिए लिखती हैं। इसके अलावा वह कई बार ‘टाइम’ और ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ जैसे नूज़्पैपर्स के लिए भी लिख चुकी हैं।
ऑथर ने इस किताब को अमेरिका के सिनेरियो को ध्यान में रख कर लिखा है.

कई समाजों में, लड़कियों की सेक्शूऐलिटी को लेकर लोगों की सोच और ज्यादा लिबरल हो रही है.

कल्पना कीजिए कि एक सुबह आपका पार्टनर आपकी तरफ मुड़कर आपसे कहता है या कहती है- “मैं तुम्हारे साथ सिर्फ इसलिए हूँ क्योंकि मैं इतना अट्रैक्टिव नहीं हूँ कि मुझे तुमसे बेहतर कोई मिल पाता।” यकीनन इस बात पर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा आएगा। क्योंकि यह बात है ही इतनी अनरोमांटिक ।

हममें से ज्यादातर लोगों को लगता है कि प्यार के नियम सप्लाई और डिमान्ड के कड़े लॉजिक में फिट नहीं बैठते हैं। लेकिन इस किताब में हम जानने वाले हैं कि कैसे हमारी ज्यादातर रोमांटिक चॉइसेस, खरीददारी के हमारी डिसिसन्स से बहुत ज्यादा अलग नहीं होती। अगर हम दिल के किरदार को थोड़ी देर के लिए हटा देते हैं तो हमें यह जानकर बड़ी हैरानी होती है कि पैसा और पैसे से जुड़े फ़ैक्टर्स किस हद तक प्यार और प्यार की भागीदारी से जुड़े हमारी फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं।

अगर आप सेक्शूऐलिटी के प्रति अपने विचारों की तुलना अपने दादा-दादी जी के विचारों से करेंगे तो यकीनन आप खुद के विचारों को ज्यादा लिब्रल यानि खुला पाएंगे। समय के साथ अलग-अलग समाजों में सेक्स के प्रति खुला नजरिया आया है और अब इसे सीधे तौर पर नैतिकता के साथ नही जोड़ा जाता है। आजकल की पढ़ी-लिखी और इंडिपेंडेंट औरते, पहले के जमाने की औरतों की तुलना में सेक्स के प्रति ज्यादा ओपन है और इसकी एक ईकनामिकल एक्स्प्लनैशन भी मौजूद है। आजकल औरतें सेक्स के प्रति काफी कैजुअल हो गई हैं।

इसकी सबसे बड़ी वजह है- पैसा। आजकल की महिलाओं के पास पर्याप्त पैसा है जिससे वे काफी आसानी से Contraceptives (निरोधकों) खरीद सकती है और उन्हें सेक्स से फैलने वाली बीमारिया (STDs) जैसे AIDS आदि फैलने का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा उन्हें अनचाही प्रेग्नन्सी से भी छुटकारा मिल जाता है। साथ ही साथ आजकल की महिलाओं को इस बात की जानकारी भी अच्छी तरह होती है कि कान्ट्रसेप्टिव को सही तरह से कैसे यूज करना है।

अगर हम आज से 1 या 2 पीढ़ी पीछे जाते है तो महिलाओं को आज जितनी आजादी है, उस वक्त इससे आधी आजादी भी नहीं प्राप्त थी। जो औरत शादी से पहले एक से ज्यादा लोगों के साथ सेक्शुअल संबंध रखती थी उसे समाज से बेदखल कर दिया जाता था। उन्हें सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा किया जाता था और उनकी प्रतिष्ठा को मिटा दिया जाता था।

आजकल हालांकि शादी से पहले और शादी के बाद के संबंध के संबंधों को काफी खुले तौर पर स्वीकार किया जा रहा है। आजकल एक ठीक-ठाक पढ़ी-लिखी महिला भी अच्छा-खासा पैसा कमा रही है, जबकि पहले के समय में ऐसा नहीं था। इसलिए आजकल अगर एक महिला चाहे तो अपने दम पर अपने बच्चों को एक अच्छी ज़िंदगी दे सकती है। समाज की बेहतर होती सोच का ही नतीजा है कि आज, अगर किसी महिला को अनचाही प्रेग्नन्सी हो जाती है, तो उसे समाज में उतनी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता है, जितना कुछ पीड़ियों पहले करना पड़ता था।

पैसे और समाज से जुड़े जोखिमों में कमी आने से, शादी से पहले पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है.

अगर आपको लगता है कि बर्थ कंट्रोल पिल्स और कोन्डम जैसे सुरक्षित और विश्वसनीय कोन्टरासेपटिव्स के आने से प्रेगनेंसीस की संख्या में गिरावट आई है तो आप पूरी तरह गलत है! क्योंकि साल-दर-साल शादी से पहले होने वाले बच्चों की संख्या में लगातार भारी इजाफा हो रहा है। यह आपको एक विपरीत परिस्थिति लग सकती है। लेकिन याद रखिए, लोगों की फाइनैन्शल स्थिति मजबूत हो रही है और प्रीमैरिटल सेक्स से जुड़े सामाजिक रिस्क तेजी से कम हो रहे है, जिससे ऐक्टिव सेक्स लाइफ की संख्या में इजाफा हो रहा है।

अगर हम आज से करीब 100 साल पीछे जाएँ तो 1925 में अगर एक कुंवारी लड़की किसी आदमी के साथ असुरक्षित सेक्स करती थी तो उसके गर्भवती होने की संभावना करीब 85% होती थी। आज के संमय में यह कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन उस जमाने में यह बहुत बात हुआ करती थी। शादी से पहले प्रेग्नन्ट होने की वजह से उस समय महिलाओं को बदनामी का सामना करना पड़ता था और उन्हें अपने लिए काम और पति दोनों को ही ढूंढने में बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। इससे पैसों को लेकर भी कई सारी चुनौतियाँ खड़ी हो जाती थी।

चलिए इन चुनौतियों का कुछ हिसाब लगाते है। मान लेते है कि एक कुंवारी लड़की की साल 1925 में लाइफटाईम इनकम 45,000 डॉलर है। अगर वह किसी व्यक्ति के साथ शादी से पहले सेक्स करती है तो इस बात के 85% चांस हैं कि वह प्रेग्नन्ट हो जाए। अब हम इस 85% संभावना का गुना 1925 के जमाने में उसकी ज़िंदगीभर की कमाई से करते हैं जो कि है- 45,000 डॉलर्ज़….. 0.85 x 45,000 = 38,250 Dollars.

इस तरह शादी से पहले सेक्स करने के लिए उस लड़की को करीब अढ़तीस हजार डॉलर्ज़ की कीमत चुकानी पड़ी।
चलिए इस सिनेरियों में एक कदम आगे बढ़ते है। अगर कोंडोम 1925 में उपलब्ध होते है इनसे प्रेग्नन्ट होने की संभावना 45% तक कम हो जाती। इस तरह अब महिला की करीब 20,250 डॉलर्ज़ की संपत्ति खतरे में रहती।

खतरों के कम होने की वजह से आज ज्यादातर लोगों को शादी से पहले सेक्स छोटी बात लगने लगी है। और आज के समाज की फ्लेक्सबल और लिब्रल सोच को भी जब हम इस इक्वैशन में जोड़ देते हैं तो शादी से पहले सेक्स के लिए चुनौतियाँ और भी कम हो गई है।

हालांकि नजरिए में ऐसा बदलाव एकदम से होने के बजाय धीरे-धीरे होता है। जैसे- जब लिब्रल एरिया के लोग शादी से पहले सेक्स करके भी समाज में एक अच्छा जीवन जीते है तो इससे कन्सर्वटिव एरिया में रहने वाले लोगों को एक तरह की प्रेरणा मिलती है। आखिरकार कन्सर्वटिव एरिया में रहने वाले लोग दूसरे लोगों की सोच को महत्व देना छोड़ देते हैं और वक्त के साथ उनका नजरिया और भी ज्यादा लिब्रल हो जाता है।

गर्भनिरोधक (contraceptive) उपाय चाहे कितने भी प्रभावशाली क्यों न हो, वे कभी भी 100% प्रभावशाली नहीं होते है। यहाँ तक कि 45% सेक्सुअली ऐक्टिव महिलाएं कभी न कभी प्रेग्नन्ट हो ही जाती है, जिसकी वजह से मॉडर्न दुनिया में कान्ट्रसेप्टिव से पहले की दुनिया की तुलना में कई अधिक संख्या में बच्चे पैदा हो रहे है। सप्लाई और डिमांड के नियम के कारण महिलाएं कॉलेज में ज्यादा सेक्सुअली ऐक्टिव हो गई हैं. अगर इस मामले में कॉलेज में आप लकी नहीं रहे तो कोई बात नहीं। हो सकता है यह आपके फेवर में न रहा हो।

जब हम कॉलेज कॅम्पस में सेक्शुअल ऐक्टिविटीज पर करीब से नजर डालते है तो हमें पता चलता है कि सप्लाइ और डिमांड का नियम यहाँ भी लागू होता है। और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि अगर कोई लड़का, बहुत ज्यादा लड़कियों की संख्या वाले कॉलेज में अड्मिशन लेता है, तो इस बात के काफी चांस होते हैं कि वह ग्रेजुएशन पूरा होने से पहले सेक्स को इक्स्पीरीअन्स कर ले।

कॉलेज में छात्राओं की लगातार बढ़ रही संख्या से यह ट्रेंड भी लगातार बढ़ रहा है। यहाँ तक कि कई कॉलेजों में तो छात्राओं की संख्या, छात्रों की संख्या से भी ज्यादा है। आपको यह जानकार हैरानी हो सकती है कि कॅनडा में सिर्फ 42% स्टूडेंट्स मेल (Male) है। अर्थशास्त्र के शब्दों में, कॉलेज मेल स्टूडेंट्स के लिए एक “बायर्स मार्केट” है और फीमैल स्टूडेंट्स की संख्या में इजाफा होने से सेक्स मार्किट्प्लैस में उनकी ताकत में भी बढ़ोतरी होती है। यह पूरी तरह सप्लाई और डिमांड का खेल है। अगर मार्केट में किसी प्रोडक्ट या सर्विसेज़ की उपलब्धता बढ़ जाती है तो उस चीज का दाम गिर जाता है। कॉलेज के तथाकथित बाजार में आज फीमैल स्टूडेंट्स की संख्या ज्यादा है। इस तरह सेक्स मार्केट में वे ज्यादा संख्या में उपलब्ध रहेंगी और उनकी वैल्यू भी कम होगी, जिस वजह से युवा मेल स्टूडेंट्स को सेक्स आसानी से अवैलबल हो पाएंगी। ये सबकुछ मार्केटफोर्स की वजह से हो रहा है।


लेखक मार्क रेगनरस और जेरेमी यूकर के द्वारा उनकी किताब “Premarital Sex in America” में किये गए एक अध्ययन के मुताबिक, अगर एक कॉलेज कॅम्पस में मेल स्टूडेंट्स की संख्या फीमैल्स के मुकाबले ज्यादा है तो 45% चांस होते हैं कि फीमैल स्टूडेंट्स ग्रेजुएशन तक अपनी वर्जिनिटी को बचाकर रख सके। लेकिन जब कॅम्पस में फीमैल्स की संख्या ज्यादा हो जाती है यह आंकड़ा 30% तक गिर जाता है। इससे पता चलता है कि जब मेल्स की कमी होती है तो फीमैल्स का सेक्सुअली ऐक्टिव होने के प्रति रवैया काफी हद तक बदल जाता है।

इंटरनेट डेटिंग साइट्स के क्राइटीरिया ने एक छोटे मार्केटप्लेस को जन्म दिया है।

अगर आपने कभी ऑनलाइन डेटिंग को ट्राई की है तो आपको यह जरूर पता होगा कि इन साइट्स में हजारों लोग होते है, जिनमें से हर एक की प्रोफाइल चेक करना मुमकिन नहीं होता है। इसलिए एक-एक प्रोफ़ाइल को चेक करके अपना मैच ढूंढने के बजाय, ये साइटें आपसे आपकी पसंद-नापसंद को लेकर कुछ सामान्य सवाल पूछती हैं, जिनका जवाब आपको कुछ ऑप्शन्स में से देना होता है। हालांकि कभी-कभी ये डेटिंग साइट्स बड़े-बड़े सवाल भी पूछती हैं, जिससे मार्किट्प्लैस छोटा हो जाता है और आपको अपना परफेक्ट मैच मिलने की संभावना कम हो जाती है।

“आपके पार्टनर की उम्र और हाइट कितनी होनी चाहीये?” जैसे सवाल ऑनलाइन डेटिंग मार्केटप्लेस को सिकोड़ देते हैं। इस तरह के मार्केटप्लेसेस को अर्थशास्त्र में Thin Marketplace कहा जाता है। एक थिन मार्किट्प्लैस ऐसा बाजार होता है जहाँ पर किसी ऐसी चीज का व्यापार करना बेहद मुश्किल होता है, जिसको खरीदने वाले भी कम लोग होते हैं और बेचने वाले भी। इस तरह के मार्केट्स में हमें ज्यादातर वही लोग मिलते हैं जिनके पास इसके अलावा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं होता है या फिर बैड डील करना उनकी मजबूरी होती है। इस तरह के मार्केट्स में कोई भी व्यक्ति संतुष्ट नहीं होता।

इसी तरह ऑनलाइन डेटिंग मार्किट्प्लैस भी बहुत ज्यादा संतुष्टिकारक नहीं है। ऐसी साइटों में दो लोग जो शायद एक-दूसरे के लिए परफेक्ट मैच हों, लेकिन सिर्फ इसलिए कभी न मिलें क्योंकि उनके इंटरेस्ट अलग-अलग हों। एक हेल्थी मार्किट्प्लैस बनने के लिए ऑनलाइन डेटिंग साइट्स को हाइट, ऐज जैसे quantitative criterias के बजाय experiential criterias को ज्यादा अहमियत देनी चाहिए।

एक्स्पेरीएन्शल क्राइटीरियास ज्यादा विश्वसनीय होते हैं क्योंकि ये हमारे एक्सपीरियंस और लोगों के साथ इंटरैक्ट करने के तरीके पर आधारित होते हैं। मसलन, एक व्यक्ति का सेन्स ऑफ ह्यूमर, उसके बैंक अकाउंट के साइज़ और टीवी देखने की उसकी आदत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचिए जिससे आप सच में प्यार करते हैं। क्या आपको लगता है कि वह आपके द्वारा डेटिंग साइट्स पर लगाए गए फिलटर्स क्राइटीरियास पर फिट बैठ सकता है? बेशक नहीं!? असल ज़िंदगी में हो सकता है कि आपका टू लव आपसे हाइट में कुछ इंच बड़ा हो या फिर उसका बैंक अकाउंट आपके द्वारा लगाए गए फ़िल्टर से थोड़ा-सा कम हो।


शादी हाउसहोल्ड यानि घर-ग्रहस्थी और बेडरूम के लिए एक अच्छा इकनॉमिक सेन्स तैयार करती है. क्या आपने कभी सोचा है कि लोग शादी क्यों करते हैं? चाहे आपको यह सवाल कितना भी बेहूदा क्यों न लगे लेकिन यह गलत नहीं है। दरअसल शादी का कनेक्शन रोमांस से ज्यादा ईकनामिक्स से जुड़ा हुआ है। घर-ग्रहस्थी किसी भी मामले में एक बिजनेस से कम नहीं है। बिजनेस पार्टनर्स की ही तरह, मेरिज पार्टनर भी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। कुछ काम एक पार्टनर बखूबी कर सकता है जबकि अन्य काम दूसरा पार्टनर । इस तरह एक-दूसरे के बिना दोनों ही पार्टनर अधूरे हैं। इस तरह शादी कर लेने से घर-ग्रहस्थी का बिजनेस अच्छी तरह से चल जाता है क्योंकि दो लोग घर को अच्छी तरह संभाल लेते हैं।

एक ग्रहस्थी में कई तरह के घरेलू काम या कहें जॉब्स होते हैं; जैसे- साफ- सफाई, लौंडरी, बिल भरना, घर का सामान लाना। दो लोग होने से घर ये सारे काम करना बेहद आसान हो जाता है। इस तरह हो सकता है कि एक व्यक्ति को कारपेंट्री का शौक हो, वहीं दूसरे व्यक्ति को बुक्कीपिंग करना अच्छा लगता हो। अलग-अलग व्यक्तियों को उनकी पसंद के काम बाँट देने से ग्रहस्थी ठीक-तरह से चल पाती है। यही बात बेडरूम पर भी लागू होती है। अर्थशास्त्र के शब्दों में, ‘SEX’ को एक ‘चीज’ (good) माना जा सकता है जिसे लोग इक्स्पीरीअन्स करना चाहते हैं। वहीं इसे एक ‘Service’ भी माना जा सकता है जिसे शादी ठीक तरह से रेगुलेट करती है।

बाजार में सेक्स मिलने में बहुत समय लगता है और इसके लिए काफी प्रयास भी करने पड़ते हैं। इसलिए एकोनॉमिकली यह बेहतर है कि हम इसे अपनी ग्रहस्थी का ही एक हिस्सा बना लें। शादी करने से सेक्क्सुअल बीमारियों, हिंसा और हयूमिलीशन का खतरा कम हो जाता है वहीं अवैध मार्केट में सेक्स करने पर होने वाली गिरफ़्तारी का खतरा भी टल जाता है। इस बात पर कोई शक नहीं है कि शादी, सेक्स पाने का सबसे बेहतरीन तरीका है।

अर्थशास्त्र के प्रोफेसर्स डेविड ब्लैन्चफ्लार और एंडू ओसवाल्ड के द्वारा साल 2004 में की गई एक रिसर्च की मानें तो 76% शादीशुदा लोग महीने में 2 से 3 बार सेक्स करते हैं जबकि सिर्फ 57% गैर-शादीशुदा लोग ही महीने में इतनी बार सेक्स कर पाते हैं।

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कमाई बढ़ने से पॉलीगेमी यानि बहुविवाहों की संख्या में कमी आई है जिससे महिलाओं की मैरिटल पॉवर्स में बढ़ोतरी हुई है.

क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों कुछ समाजों में एक से ज्यादा शादियां करने की इजाजत है? हो सकता है कि आपको यह बात थोड़ी सी अजीब लगे लेकिन कई देशों में कई कारणों से एक से ज्यादा शादियाँ करना अलाउड है, खासकर ईकनामिकल कारणों की वजह से। इकनॉमिक नजरिए से देखें तो एक लड़की किसी गरीब आदमी की पहली पत्नी बनने के बजाय किसी अमीर आदमी की दूसरी या तीसरी बीवी बनना ज्यादा पसंद करेगी। अमीर की दूसरी या तीसरी पत्नी बनने के लिए लड़की को कई तरह की कीमतें चुकानी पड़ेगी हालांकि इससे उसे कई सारे ईकनामिकल फायदे भी होंगे।

घर में सौतन आ जाने से अमीर की पहली पत्नी को कुछ मानसिक परेशानी उठानी पड सकती है। हालांकि अभी भी पैसे की कोई कमी नहीं है इसलिए इससे उनकी ग्रहस्थी पर ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है। और अगर उनका पति खुश है तो सबकुछ सही है। है ना? हो भी सकता है और नहीं भी! हालांकि जब हम गरीब आदमियों और अनपढ़ महिलाओं की संख्या कम करने लगते हैं तो बहुविवाह का ज्यादा कुछ सेन्स नहीं बनता है।

औद्योगिक क्रांति और शहरों की तरफ पलायन के बाद लोगों के लिए कम बच्चे पैदा करना ही बेहतर है जो मानसिक तौर पर स्मार्ट हों। क्योंकि अब हमें पहले की तरह खेतों को संभालने के लिए बहुत सारे बच्चों की कोई खास जरूरत नहीं है। इस तरह आधुनिक दुनिया में बच्चों को एक अच्छी जॉब पाने के लिए जरूरी है कि वे स्मार्ट हों। और बच्चों को इंटेलिजेंट बनाने के लिए जरूरी है कि उनकी माँ इंटेलिजेंट हो जिसके साथ वे अपना सबसे ज्यादा समय बिताते हैं। ये नई ईकनामिकल जरूरतें औरतों के लिए एक वरदान साबित हुई। और इस तरह स्किल्ड वाइव्स की बढ़ती मांग के कारण महिलाओं को अपना पति चुनने की ज्यादा आजादी मिलने लगी।

और यह स्वाभाविक है कि बहुत सारे काम जानने वाली महिला आसानी से फाइनैन्शल फ्रीडम अचीव कर ले। इस तरह फाइनैन्शली फ्री महिला के पास पैसा और संसाधन दोनों ही चीजें होंगी जिससे वह किसी व्यक्ति की दूसरी या तीसरी बीवी बनना हरगिज भी पसंद नहीं करेगी। और इस स्थिति में अगर वह चाहे तो एक गरीब व्यक्ति से भी शादी कर सकती है।

इस तरह जैसे-जैसे समाज शिक्षित होता गया, बहु-विवाह के ट्रेंड में कमी आने लगी। और आगे हम जानने वाले हैं कि कैसे शिक्षा ही वह चीज है जो पती-पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने में मदद करती है। हममें से बहुत सारे लोगों को लगता है कि प्यार वो चीज है जो दो लोगों को आपस में जोड़े रखती है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। शादी को टिकाए रखने में पैसे और एजुकेशन का भी बड़ा योगदान होता है।

इकनॉमिक प्रोफेसर फिलिप ऑरिओपोरस (Philip Oreopoulos) और जेल सैलवेंस (Kjell Salvanes) के द्वारा हाल ही में कन्डक्ट की गई एक रिसर्च के अनुसार, जिन लोगों के पास एक पोस्ट्ङ्ग्रेजूइट डिग्री होती है उनका तलाक होने के सिर्फ 3% चांस होते हैं। वहीं जिन लोगों के पास सिर्फ हाई स्कूल डिप्लोमा होता है उनके तलाक होने के चांसेस करीब 16% होते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि अच्छी शिक्षा पाने वाले लोगों को अच्छा पार्टनर मिलता है बल्कि इसका मतलब यह है कि बेहतर शिक्षा वाले लोग आमतौर पर ज्यादा अच्छा पैसा कमा पाते हैं। पैसे से जुड़ी दिक्कतों से तनाव पैदा होता है जो शादियाँ टूटने का सबसे बड़ा कारण है।

एक ऐसी कालोनी की कल्पना कीजिए जहाँ पर हर फ़ैमिली का घर एक जैसा दिखता हो। हर व्यक्ति एक जैसे कपड़े पहनता हो और एक जैसी गाड़ी चलाता हो। अब मान लीजिए कालोनी का एक परिवार अचानक बहुत ज्यादा पैसे कमाने लगता है। इस तरह वे अपने लिए एक शानदार मकान तैयार करते हैं और महंगे-महंगे कपड़े और गाड़ियां खरीदना शुरू कर देते हैं।

अब कालोनी के दूसरे लोगों को भी लगने लगेगा कि उनके पास भी वे सब चीजें होनी चाहिए जो उस अमीर परिवार के पास है क्योंकि कोई भी इंसान गरीब नहीं दिखना चाहता। हो सकता है कि एक-दो परिवार अमीर बनने के लिए सैविंग करना शुरू कर दें, लेकिन फिर भी ज्यादातर परिवार उस अमीर परिवार के जैसे बनने के लिए लोन्स का सहारा लेंगे, जिससे वे अपनी फाइनैन्शल स्थिति को बद से बदतर बना देंगे, जिससे उनके तनावग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाएगी।

जब कोई परिवार पैसों से जुड़ी किसी समस्या में फँसता है तो इससे एक कठिन और स्ट्रेस्फल समस्या उत्पन्न हो जाती है। अब पैसे की कमी की वजह से व्यक्ति अपनी क्षमता से ज्यादा काम करने लगेगा जिससे और ज्यादा तनाव पैदा होगा। और अगर इस तरह की स्थिति लगातार बनी रहती है तो शादी टूटने में बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
दुर्भाग्य से आजकल की दुनिया में पैसों से जुड़ी समस्याएं और शादी-तोड़ने वाला स्ट्रेस बहुत ही ज्यादा कॉमन है।

अर्थशास्त्रियों एडम लिवाइन, रॉबर्ट फ्रैंक, ओएगे डीज़्क (Oege Dijk) के द्वारा की गई रिसर्च की मानें तो जिन देशों में लोगों के बीच आर्थिक  असमानता ज्यादा होती है उनमें अक्सर तलाक के रेट्स ज्यादा पाए जाते हैं यानि ज्यादा तलाक होते हैं। यहाँ तक कि ये दोनों चीजें इस कदर आपस में जुड़ी हैं कि अगर देश की आर्थिक असमानता में 1% की बढ़ोतरी होती है तो तलाक दर करीब 1.2% बढ़ जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो समाज में एक परिवार का फाइनैन्स जितना ज्यादा बढ़ता है, उतना ही ज्यादा खतरा दूसरे परिवारों की शादी टूटने का बढ़ जाता है।

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प्यार और सेक्स में सिर्फ डिसायर्स और ईमोशन्स मायने नहीं रखते हैं बल्कि एक इकनॉमिक नजरिए से देखा जाए तो हमारी चॉइसेस और उनके नतीजे प्यार और सेक्स की हमारी ज़िंदगी को बेहद गहराई से प्रभावित करते हैं। यहाँ तक कि हम डेटिंग, शादी और तलाक की रहस्यमयी दुनिया को भी इकनॉमिक पॉइंट से इक्स्प्लैन कर सकते हैं।

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