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Decisive

 

Decisive

Chip Heath & Dan Heath

अपनी जिन्दगी और काम में बेहतर फैसले लेना सीखो

डिसिजिव (Decisive) में हम देखेंगे कि किस तरह से हम अपने काम से संबंधित, अपने कैरियर से संबंधित और अपनी जिन्दगी या परिवार से संबंधित बेहतर फैसले ले सकते हैं। यह किताब बहुत से हालातों का एक्साम्पल लेकर हमें उन अलग अलग तरीकों के बारे में बताती है जिससे हम खुद के लिए एक बेहतर जिन्दगी चुन सकते हैं।

 

लेखक

चिप हीथ (Chip Heath) स्टैंफॉर्ड ग्रैजुएट स्कूल आफ बिजनेस में एक प्रोफेसर हैं। वे बिजनेस स्ट्रैटेजी के बारे में पढ़ाते हैं। वे न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्ट सेलिंग लेखक हैं।

डैन हीथ (Dan Heath) चिप हीथ के भाई हैं और वे भी एक बेस्ट सेलिंग लेखक हैं। वे ड्यूक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं और एक स्पीकर हैं। अपने भाई चिप के साथ उन्होंने चार किताबें लिखी हैं।

हर दिन हमें अपनी जिन्दगी में कुछ फैसले लेने होते हैं।

हर दिन हमें यह तय करना होता है कि हमें अपनी जिन्दगी की गाड़ी को किस रास्ते पर ले जाना चाहिए। कभी कभी यह बहुत आसान होता है, लेकिन कभी कभी फैसला लेने का काम बहुत मुश्किल हो सकता है। बहुत बार हम अपनी भावनाओं के बीच और लाजिक के बीच में आकर फँस जाते हैं। बहुत बार हम यह पता नहीं कर पाते कि हमारे फैसले का नतीजा क्या होगा। ऐसे हालात में हम कैसे बेहतर फैसले ले सकते हैं?

यह किताब हमें उन खास तरीकों के बारे में बताती है जिसका इस्तेमाल कोई भी कर के अच्छे फैसले ले सकता है। यह किताब हमें बताती है कि किस तरह से हालात को अच्छे से समझ कर, अपनी भावनाओं को और भविष्य में मिलने वाले नतीजों के बारे में सोचकर किस तरह से आप अच्छे फैसले ले सकते हैं।

जब भी आपको फैसले लेने में परेशानी हो तो अपने फैसलों के नतीजों के बारे में सोचिए।

हमें हर रोज कुछ छोटे छोटे फैसले लेने होते हैं। एक्साम्पल के लिए

-उसे बता दे, या ना बताएँ?

– पार्टी करने जाएं, या ना जाएं?

जब भी आप इस तरह से हालात में खुद को पाएं तो सबसे पहले यह पता करने की कोशिश कीजिए कि आपके फैसलों का लम्बे समय में आपके ऊपर क्या असर होगा। एक्साम्पल के लिए, अगर आप यह फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि आपको 15,000 का टीवी खरीदना चाहिए या 25,000 का, तो यह पता करने की कोशिश कीजिए कि उन दोनों को ही खरीदने के क्या नतीजे हो सकते हैं। क्या 15,000 का टीवी जल्दी खराब हो जाएगा और उसे रिपेयर करने के पैसे लगेंगे? क्या वो अच्छी साउंड और पिच्चर क्वालिटी नहीं देता? अगर ऐसा है, तो 25,000 का टीवी लेना ज्यादा अच्छा होगा।

इसे अपार्च्यूनिटी कास्ट कहा जाता है, जिसके बारे में सोचना लोग अक्सर भूल जाते हैं। एक रीसर्च में जब कुछ लोगों से कहा गया कि वे अपना मनपसंद वीडियो या तो खरीद लें, या ना खरीदें, तो 75% लोगों ने उसे खरीद लिया। लेकिन जब उनसे कह गया कि वे या तो उसे खरीद लें या अपने पैसों को कुछ और खरीदने के लिए रखे रहें, तो सिर्फ 55% ने उसे खरीदा। जब लोगों को बताया गया कि उनके पास खरीदने या ना खरीदने के अलावा भी कुछ आप्शन है, कि वे कुछ और खरीद सकते हैं, तो कम लोगों ने उसे खरीदा।

इसके बाद हमेशा यह देखने की कोशिश कीजिए कि आपके पास दूसरे कौन कौन से आप्शन है। जरूरी नहीं है कि आपके पास सिर्फ दो ही आप्शन हो। एक्साम्पल के लिए अगर आप यह सोच रहे हैं कि पार्टी करने जाएं या ना जाएं, तो आप यह देख सकते हैं कि अपना समय बिताने के लिए आप और क्या क्या कर सकते हैं जो कि फायदेमंद हो। आप अपने दोस्तों के साथ घूमने जा सकते हैं या फिर कोई कहानी पढ़ सकते हैं।

जरूरी नहीं है कि आपके फैसले हमेशा “हाँ या ना” ही हो। आपके पास हमेशा दूसरे आप्शन होते हैं और आपको उसका फायदा उठाना चाहिए।

किसी समस्या को सुलझाते वक्त बहुत सारे तरीके अपनाइए।

यह जरूरी नहीं है कि आप एक समस्या का सिर्फ एक हल निकालें और उसी से उसे सुलझाएँ। कभी कभी बहुत से हल निकाल कर उनमें से सबसे बेहतर को चुनना ज्यादा फायदेमंद होता है। इस तरह से फैसले लेना बहुत आसान हो जाता है और हम कम समय में अच्छे फैसले ले पाते हैं।

एक्साम्पल के लिए एक स्टडी में कुछ ग्राफिक डिजाइनर्स से एक ऐड डिजाइन करने के लिए कहा गया। एक ग्रुप के डिजाइनर्स ने एक बार में सिर्फ एक ऐड डिजाइन किया, लेकिन दूसरे ग्रुप के डिजाइनर्स ने तीन ऐड डिजाइन किए। इसके बाद दूसरे ग्रुप के डिजाइनर्स ने उन डिजाइन्स को दिखाकर फीडबैक लिया और फिर उनमें से एक को चुना।

अब उनका चुने गए ऐड ने मार्केट में कितने कस्टमर्स का ध्यान खींचा यह तो नहीं पता, लेकिन उनका ऐड मैगज़ीन एडिटर्स को सबसे ज्यादा पसंद आया। इसकी वजह यह है कि जब तीन तरह के ऐड डिजाइन कर के उन्होंने उसके लिए फीडबैक लिया तो वे उसमें से सबसे अच्छे को पहचान पाए। इससे उनका काम की अच्छी क्वालिटी निकल कर सामने आई।

इसके अलावा बहुत से आप्शन होने पर आपके पास दूसरे प्लान हो जाते हैं। अगर एक तरीका काम नहीं करेगा, तो दूसरा करेगा। अगर वो भी नहीं काम करेगा, तो तीसरा करेगा। साथ ही एक से ज्यादा आप्शन होने पर आप एक ही चीज़ पर कम ध्यान लगाते हैं जिससे आप कम समय में फैसला ले पाते हैं।

लेकिन यहां पर एक समस्या यह है कि जब बहुत से आप्शन सामने रख दिए जाते हैं, तो लोग फैसला नहीं कर पाते कि उन्हें किसे चुनना चाहिए। एक स्टडी में एक राउंड में 24 किस्म की जेली रखी गई और दूसरे राउंड में 6 किस्म की जेली रखी गई। यह देखा गया कि जब आप्शन कम कर दिए गए थे तो लोग ज्यादा जेली खरीद कर बाहर निकले। बहुत ज्यादा आप्शन हो जाने से वे तय नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें कौन सी जेली खरीदनी चाहिए। इसलिए आप्शन एक से ज्यादा रखिए, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं।

हर समस्या का नया समाधान खोजने की कोशिश मत कीजिए।

जब आप उन लोगों के साथ रहते हैं जिनके पास आप से ज्यादा अनुभव है तो आप अपनी समस्याओं को जल्दी सुलझा पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहाँ पर बहुत से लोग हैं जो वो काम कर चुके हैं जो कि आप करने जा रहे हैं और आप जिस समस्या को लेकर परेशान हैं, वे उससे पहले ही निपट चुके हैं। उनसे मदद माँग कर आप बहुत आसानी से उसे सुलझा सकते हैं और अपना बहुत सारा समय बचा सकते हैं।

या फिर आप अपने प्रतियोगी को देख सकते हैं कि वो इस काम को किस तरह से कर रहा है। बहुत से बिजनेसमैन अपने काम्पटीटर्स की नकल करते हैं और उसे अपने बिजनेस में अपना कर अपनी समस्या सुलझाते हैं। आप सोच रहे होंगे कि नकल करना गलत बात है, क्योंकि स्कूल में आपको वही सिखाया गया है। लेकिन असल जिन्दगी में अगर आप किसी से सीख कर अपना समय और अपनी एनर्जी बचा रहे हैं, तो इससे ज्यादा फायदे की बात नहीं हो सकती।

इसके अलावा आप प्रेरणा ले सकते हैं। यह देखिए कि उस तरह की समस्या के जैसी समस्या और कहाँ कहाँ पर है और वहाँ उसे किस तरह से सुलझाया जा रहा है।

इसका एक अच्छा एक्साम्पल है एरोप्लेन या शिप्स का माडल। जब यह सोचा जाने लगा कि एरोप्लेन का माडल किस तरह का रखा जाए जिससे हवा के साथ उसका फ्रिक्शन कम हो और वो आसानी से उड़ सके, तो लोगों ने चिड़िया का आकार देखना शुरू किया। ठीक ऐसे ही शिप्स का माडल डिजाइन करने के लिए लोगों ने मछलियों को देखा कि उनकी बनावट कैसी है। उसके हिसाब से उन्होंने इसका माडल तैयार किया।

इस तरह से यह जरूरी नहीं है कि हर समस्या का एक अलग समाधान हो। आप उस तरह की दूसरी चीजों को देखकर उनसे सीख सकते हैं और हल निकाल सकते हैं।

अपने लिए गए फैसले के नेगेटिव साइड के बारे में सोचकर आप अच्छे फैसले ले सकते हैं।

यह जरूरी नहीं है कि आप जो फैसले ले रहे हैं उसका नतीजा हमेशा सही हो। अक्सर फैसले लेते वक्त हम एक तरफा सोचने लगते हैं। हम बस उन नतीजों पर ध्यान देने लगते हैं जो कि हमारे लिए अच्छे हैं, लेकिन उसी फैसले के लिए गए गलत नतीजों के बारे में हम नहीं सोचते हैं।

इसलिए सबसे पहले यह देखिए कि आपके लिए गए फैसले के गलत नतीजे क्या हो सकते हैं। नेगेटिव सोचने की कोशिश कीजिए, ताकि आप उसके नेगेटिव साइड को खोजकर उसे सुधार सकें। अगर आप प्लान करते वक्त या फैसले लेते वक्त हमेशा अच्छा ही सोचेंगे, तो आपके प्लान का नतीजा कभी अच्छा नहीं होगा।

लेकिन कभी कभी यह हो सकता है कि आप खुद से उसमें कमियां ना निकाल पाएं। आप जिससे प्यार करते हैं, उसमें कमियां निकालना बहुत मुश्किल होता है। तो किसी और को उसमें कमियां निकालने का मौका दीजिए। किसी दूसरे व्यक्ति से कहिए कि वो आपको यह बताए कि आपका यह फैसला किस तरह से गलत हो सकता है। हो सके तो उस व्यक्ति से यह करने के लिए कहिए जो आपको नापसंद करता हो।

एक्साम्पल के लिए अगर आपके सामने दो तरह की नौकरियां रख दी जाएं जिसमें एक में आपको बहुत अच्छा पैसा और बहुत काबिल लोग मिल रहे हैं साथ काम करने के लिए और दूसरे में सैलेरी कुछ कम है और लोग भी उतने काबिल नहीं हैं। तो इससे पहले आप पहली नौकरी को चुनें, यह देखिए कि उन दोनों में काम कितना ज्यादा है और वहाँ के कर्मचारी खुद के लिए कितना समय निकाल पाते हैं। यह पता करने की कोशिश कीजिए कि पहली नौकरी से आपको क्या सीखने को मिल रहा है और दूसरी से क्या सीखने को मिल रहा है और लम्बे समय में उन में से कौन सी नौकरी आपके लिए अच्छी रहेगी। इस तरह से आप अच्छे फैसले ले सकते हैं।

अपने हालात को बाहर से देखने की कोशिश कीजिए ताकि आप उसे अच्छे से समझ सकें।

यह जरूरी नहीं है कि आप अपने हालात को जिस तरह से देख रहे हैं, असल में उसकी शकल वैसी ही हो। हो सकता है आप उसका सिर्फ एक पहलू देख रहे हों और उसका दूसरा पहलू कुछ और ही कह रहा हो। इसके लिए अपने हालात को बाहर से देखने की कोशिश कीजिए।

हालात को बाहर से देखने का मतलब कुछ ऐसी जानकारी पर ध्यान देना जिससे आपको यह पता लग सके कि आपका लिया गया फैसला कितना अच्छा है। एक्साम्पल के लिए बहुत से लोग स्टीव जाब्स और बिल गेट्स को देखकर प्रेरित हो जाते हैं और वे भी अपनी खुद की कंपनी खोलने के लिए निकल जाते हैं। लेकिन लगभग 90% स्टार्टअप्स अपने पाँचवें बर्थडे तक पहुंच नहीं पाते और नाकाम हो जाते हैं। जो 10% बचते हैं उनमें से भी 90% स्टार्टअप्स आने वाले 5 सालों में गिर जाते हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपनी कंपनी ना खोलें, लेकिन अब शायद आपको यह पता लग गया होगा कि ऊपर से यह सब कुछ जितना आसान दिखता है असल में उतना नहीं है। जब यह बात आपको पता होगी, तो आप उसके हिसाब से प्लानिंग करेंगे, एक्सपर्ट से मिलेंगे और बेहतर स्ट्रैटेजी अपनाएंगे जिससे आपके कामयाब होने की संभावना बढ़ जाएगी।

इसके अलावा अगर आप किसी एक्सपर्ट से राय ले रहे हैं तो उससे भी कुछ खास तरह की जानकारी के बारे में पूछिए क्योंकि वे लोग भी कभी कभी चीज़ों को अंदर से देखने की गलती कर देते हैं। एक्साम्पल के लिए अगर आप किसी कंपनी में अपना पैसा लगाने के बारे में सोच रहे हैं तो एक्सपर्ट से कुछ इस तरह का सवाल पूछिए इस तरह की 10 कंपनियों में से कितनी कंपनियां कामयाब होती हैं?

जब आप बात को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं तो आप अच्छे फैसले ले पाते हैं। एक्साम्पल के लिए अगर आप कहीं पर जा रहे हैं और आपको वहाँ पर रुकने के लिए होटल चाहिए लेकिन होटल की रेटिंग अच्छी नहीं है, तो आप उसके रिव्यू पर ध्यान दीजिए। हो सकता है जिन लोगों ने उसे कम रेटिंग दी हो वे उसके वाईफाई कनेक्शन की स्पीड से नाखुश हों। हो सकता है लोग उस होटल के महंगे होने की वजह से नाखुश हों। अगर आपको इस तरह की समस्याओं से परेशानी नहीं है, तो वो होटल आपके लिए अच्छा है। इस तरह से जानकारी निकाल कर आप अच्छे फैसले ले सकते हैं।

यह जरूरी नहीं है कि जो चीज आपको ऊपर से अच्छी लग रही है वो अंदर से भी अच्छी लगे।

बहुत बार हम अपने कैरियर को लेकर अच्छे फैसले नहीं ले पाते। बहुत से लोग होते हैं, वे उस कैरियर को अपना लेते हैं जो उन्हें देखने में अच्छा लगता है, लेकिन उसमें जाने के बाद उन्हें लगता है कि वो उनके लिए नहीं बनाया गया है। ऐसे में प्लान बनाकर उसपर चलने से अच्छा होगा कि आप उसपर पहले ही एक छोटा कदम उठा कर चल लें।

एक्साम्पल के लिए अगर आपको लगता है कि वकील का काम बहुत मजेदार होता है या फिर पुलिस की नौकरी में बहुत सारा एडवेंचर होता है, जैसा कि एक मूवी में दिखाया जाता है, तो उस काम को अपनाने से पहले एक इंटर्न की तरह काम कर लीजिए। इसका मतलब यह कि अलग अलग वकीलों के साथ रहकर बिना किसी अनुभव के काम करना, जिससे आप इस काम के बारे कुछ अनुभव ले सकें। इस तरह से आपको पहले ही पता लग जाएगा कि वो काम आपके लिए है या नहीं।

सबसे पहले छोटे आइडियाज़ को चेक करने के इस तरीके को ऊचिंग कहा जाता है। एक छोटे पैमाने पर चीजों को परखना बहुत आसान होता है। बहुत सी कंपनियां जब अपना कोई नया प्रोडक्ट लाँच करने वाली होती हैं तो वे उसे सबसे पहले ही मार्केट में नहीं उतारती, बल्कि एक छोटे से मार्केट में एक्सपेरिमेंट करने के लिए उस प्रोडक्ट को ले जाती हैं जिससे उन्हें यह पता लग सके कि ग्राहकों को यह कितना पसंद आ रहा है। इस तरह से वे यह तय कर पाती हैं कि उनका प्रोडक्ट कितना कामयाब होगा।

यह मत सोचिए कि आपका आइडिया अच्छा लग रहा है, इसलिए उसे काम भी करना चाहिए। उस आइडिया के छोटे से भाग को सबसे पहले टेस्ट कर लीजिए। बहुत सी कंपनियां इंटरव्यू लेकर अपने कर्मचारियों को काम पर रखती हैं, जो कि एक गलत तरीका है क्योंकि इंटरव्यू में नौकरी पाने के लिए लोग कभी कभी अपने ऊपर एक मास्क पहन लेते हैं और सही व्यक्ति पकड़ में नहीं आता है।

दूसरा तरीका यह होगा कि आप लोगों को सबसे पहले कुछ दिनों के लिए काम पर रख कर यह देखिए कि वे असल में कैसा काम कर रहे हैं और उनके काम करने का तरीका क्या है। इस तरह से आप अच्छे कर्मचारी को काम पर रख सकते हैं। लेकिन अगर किसी काम में आपको लगे कि आप इस तरह से छोटे पैमाने पर उसे टेस्ट नहीं कर सकते, तो उसमें घुसने से पहले अच्छी रीसर्च कर लीजिए ताकि बाद में आपको अपने फैसले पर अफसोस ना हो।

अच्छे फैसले लेने के लिए उन्हें दूसरी नजर से देखना सीखिए।

बहुत बार हम अपनी भावनाओं के हिसाब से फैसले लेते हैं। हम यह नहीं सोचते कि हमारे फैसले का हम पर लम्बे समय में क्या असर होगा। हम बस यह देखते हैं कि हमें इस समय क्या चाहिए और उसके हिसाब से हम अपना फैसला ले लेते हैं। लेकिन हो सकता है जो फैसला आपको अभी अच्छा लग रहा है, वो लम्बे समय में आपके लिए नुकसानदायक हो। इसलिए सबसे पहले अपने फैसले के उन नतीजों के बारे में सोचिए जो आपको भविष्य में देखने को मिल सकते हैं।

हमारे साथ ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमें यह अच्छे से पता होता है कि हमें इस समय क्या चाहिए, लेकिन यह नहीं पता होता कि भविष्य में क्या चाहिए होगा। इसलिए हम इस समय के हिसाब से फैसले ले लेते हैं। इस तरह की समस्या से बचने के लिए आप 10/10/10 मेथड का इस्तेमाल कर सकते हैं।

किसी फैसले को लेने से पहले यह सोचने की कोशिश कीजिए कि उस फैसले को लेने के 10 दिन बाद, 10 महीने बाद और 10 साल बाद आप कैसा महसूस करेंगे या फिर किस तरह के नतीजे आपको देखने को मिल सकते हैं। इस तरह से आपको एक अंदाजा मिल जाएगा कि वो फैसला कितना अच्छा है।

दूसरा तरीका यह है कि खुद को किसी दूसरे की नजर से देखने की कोशिश कीजिए। यह सोचिए कि अगर आपका एक खास दोस्त इस तरह की परेशानी में फँसा होता तो आप उसे क्या सलाह देते। बहुत से लोग जब इस तरह के हालात में फँसे होते हैं, तो वे खुद के लिए कुछ और चुनते हैं लेकिन अपने दोस्त के लिए कुछ और। ऐसा इसलिए क्योंकि खुद की भावनाओं से लड़ना मुश्किल होता है, जबकि दूसरों की भावनाओं के बारे में उन्हें कुछ खास नहीं पता होता। ऐसे में वे दूसरों के लिए अक्सर सही फैसला लेते हैं क्योंकि उसमें उनकी भावनाएं नहीं जुड़ी होती और वे भविष्य को देखते हुए फैसले लेते हैं, ना कि इस समय के हिसाब से।

इसलिए खुद को किसी दूसरे की नजर से देखने की कोशिश कीजिए। इस तरह से आप अपने हालात को बाहर से और अच्छे से देख पाएंगे साथ ही यह समझ पाएंगे कि आपकी कौन सी भावना आपके ऊपर हावी हो रही है।

अगर आप फैसला नहीं ले पा रहे हैं तो अपनी वैल्यूस को पहचानने की कोशिश कीजिए।

बहुत बार होता है कि हम दो चीजों के बीच में चुनाव नहीं कर पाते। हम यह नहीं तय कर पाते कि हमें किस रास्ते पर चलना चाहिए। ऐसे में यह देखिए कि आपकी वैल्यूस क्या है और लम्बे समय में आप किस तरह के हालात के साथ रहना चाहेंगे।

एक्साम्पल के लिए अगर आप यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि आपको अपने कैरियर के लिए कौन सा काम चुनना चाहिए, तो सबसे पहले उन दोनों ही रास्तों को समझने की कोशिश कीजिए कि वे आपको कहाँ पर ले जाएंगे। यह पता करने की कोशिश कीजिए कि आप किस तरह के हालात में लम्बे समय तक काम करना पसंद करेंगे। क्या आपको ऐसा काम चाहिए जिसमें काम बहुत ज्यादा हो, सैलेरी बहुत अच्छी हो और समय के साथ बढ़ने के की संभावना भी बहुत ज्यादा हो? या फिर आप कुछ ऐसा काम करना चाहेंगे जिसमें आप खुद के लिए भी समय निकाल सकें और अपने परिवार को भी समय दे सकें भले ही आपको सैलेरी बहुत अच्छी ना मिले ?

अगर आपके पास एक परिवार है और आप उसका साथ रहना चाहते हैं, तो दूसरा आप्शन ज्यादा अच्छा होगा। लेकिन अगर आपके पास अभी परिवार नहीं है और आप जिन्दगी में कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं तो आपके लिए पहला आप्शन अच्छा होगा।

लेकिन क्या हो अगर आपको लिए दोनों ही चीजें जरूरी हो तो? ऐसे में आप खुद से यह सवाल पूछ सकते हैं कि अगर आपको अपनी बची हुई जिन्दगी में सिर्फ एक काम करना हो तो वो कौन सा काम होगा? यह पता करने की कोशिश कीजिए कि कौन सी चीज आपके लिए ज्यादा जरूरी है। आप दो तरह के काम एक साथ नहीं कर सकते इसलिए उन दोनों में से बेहतर को चुनना ज्यादा जरूरी है।

खुद को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए अलग अलग नतीजों के बारे में सोचिए।

बहुत बार हम सिर्फ एक नतीजे के बारे में सोचते हैं जिससे हमारी पूरी तैयारी नहीं हो पाती। आपको असल में नहीं पता कि भविष्य में क्या क्या हो सकता है। ऐसे में सिर्फ एक हालात के बारे में सोचना गलत होगा क्योंकि उससे आपकी पूरी तैयारी नहीं हो पाएगी।

ऐसे में आप सबसे खराब और सबसे अच्छे नतीजे के बारे में सोचिए ताकि आप खुद को उसका हिसाब से तैयार कर सकें। एक्साम्पल के लिए आप एक प्रोडक्ट लाँच कर रहे हैं और वो बहुत कामयाब हो गया, तो लोगों में उसकी माँग बढ़ जाएगी। तो क्या इस तरह के हालात में आप उनकी माँग पूरी कर पाएंगे? ठीक उसी तरह खुद से यह पूछने की कोशिश कीजिए कि अगर आपका एक भी यूनिट नहीं बिका, तो उसकी वजह क्या हो सकती है? यह मत पूछिए कि आप किस तरह से नाकाम हो सकते हैं, बल्कि यह पूछिए कि – अगर एक साल बाद आप नाकाम हो जाते हैं तो उसकी क्या वजह हो सकती है। इस तरह से आप बेहतर जवाब खोज सकते हैं।

जब हम बहुत कामयाब हो जाते हैं, तो हमें उसे भी संभाल कर रखने की कोशिश करनी होती है। कामयाबी पाना बहुत आसान होता है, लेकिन कामयाब रहना मुश्किल काम है। ऐसे में जब आप यह सोचें कि आप कामयाब हो जाएंगे, तो साथ ही यह भी पता करने की कोशिश करते रहिए कि किस तरह से आप उसे बरकरार रखेंगे।

इसके अलावा खुद के लिए एक सेफ्टी फैक्टर रखिए। इसका मतलब खुद के लिए एक दूसरा रास्ता हमेशा तैयार रखिए ताकि अगर किसी वजह से यह तरीका काम ना करे, तो आप डिप्रेशन में आकर हार ना मान लें। आपके पास एक दूसरा तरीका पहले से हो और आप उससे कुछ हल निकाल सकें।

एक्साम्पल के लिए लिफ्ट को ले लीजिए। लिफ्ट के वायर के 11 गुना ज्यादा मजबूत बनाया जाता है ताकि उसके टूटने की कोई संभावना ना हो। इंजीनियर्स पहले से ही यह कैल्कुलेट कर लेते हैं कि वो वायर कितना भार सह सकता है और कितने लोगों को उस लिफ्ट में जाना चाहिए। इस तरह से वे किसी भी तरह के खतरे से निपटने की पूरी तैयारी पहले से कर के रखते हैं।

तो खुद के लिए हमेशा कुछ ज्यादा समय या ज्यादा मौके तैयार रखिए। अगर आपको लगता है कि आप एक महीने में दिया गया काम कर सकते हैं, तो खुद को 1 हफ्ते का समय ज्यादा दीजिए ताकि आप असल में उसे पूरा कर सकें।

Decisive

बुरे वक्त को पहचानने के लिए एक इंडिकेटर रखिए।

जब आप एक ही काम को बार बार काफी समय तक करते रहते हैं तो उसमें होने वाले छोटे बदलाव को आप नहीं देख पाते जो कि समय के साथ बड़े बन जाते हैं। एक्साम्पल के लिए, हो सकता है वही एक काम करना आपको अब पसंद नहीं रहा जो कभी पसंद हुआ करता था, लेकिन क्योंकि आप उसे काफी समय से करते आ रहे हैं, वो काम आपकी जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया है जिससे आपको पता ही नहीं लगता कि वो काम अब आपके ऊपर हावी हो रहा है।

इससे बचने लिए जैप्पोस नाम की एक कंपनी अपने कर्मचारियों को एक आफर देती है। अगर किसी कर्मचारी को लगे कि वो अब वहाँ पर काम नहीं करना चाहता, तो वो 4000 डालर लेकर काम छोड़कर जा सकता है। इस तरह से कर्मचारियों को भी पता रहता है कि अगर उन्हें काम नहीं पसंद है तो वे लोग पैसे लेकर जा सकते हैं, जिससे उनका कुछ खास नुकसान नहीं होगा। साथ ही कंपनी को उन कर्मचारियों से छुटकारा मिल जाता है जो अच्छे से काम नहीं कर रहे हैं। इस तरीके को ट्रिपवायर रखना कहा जाता है। ट्रिपवायर का मतलब एक ऐसा पाइंट जहाँ पर पहुंचने पर आपको यह पता लग जाए कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है और आपको कुछ दूसरा करने की जरूरत है।

इसके अलावा आप खुद के लिए एक डेडलाइन तय कर सकते हैं। यह देखिए कि आपको उस दिए गए काम को पूरा करने के लिए कितना समय चाहिए होगा और खुद को उतना समय दे दीजिए। इस तरह से आप उस दिए गए समय में उस काम को पूरा करने की पूरी कोशिश करेंगे।

तीसरा तरीका है पार्टिशन रखना। किसी बड़े काम को एक बार में करने की बजाय उसे छोटे छोटे भाग में बाँट दीजिए और एक बार में एक काम को कीजिए। इससे आपको यह पता रहता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है। अगर बीच में आपको लगे कि कुछ गलत हो रहा है, तो आप बीच में ही उसे रोक कर खुद को ज्यादा नुकसान से बचा सकते हैं।

चौथा तरीका है खतरे की घंटी को सुनना। पाइलट्स को ट्रेनिंग दी जाती है कि जब उन्हें लगे कि कुछ ठीक नहीं है लेकिन उन्हें यह ना पता हो कि उन्हें ऐसा क्यों लग रहा है, तो उन्हें चौकन्ना हो जाना चाहिए। इस तरह की भावना को, जिसमें आपको यह तो लगता है कि कुछ गलत है लेकिन क्या गलत है यह समझ में नहीं आता, लीमर कहा जाता है। एक प्लेन में अगर कुछ भी परेशानी हो जाए तो बहुत से लोगों की जान को खतरा हो जाता है। ऐसे में बुरे संकेत को अनदेखा करना अच्छा नहीं होगा।

खुद के लिए एक समय तय कीजिए।

फैसले लेते वक्त अपनी भावनाओं को खुद पर हावी मत होने दीजिए। हमेशा यह सोचिए कि आपके लिए गए फैसले का भविष्य में क्या नतीजा हो सकता है। खुद को अच्छे और बुरे, दोनों ही तरह के नतीजों के लिए तैयार रखिए। अगर आप किसी नए आइडिया को टेस्ट करना चाहते हैं, तो उसे छोटे पैमाने पर टेस्ट कीजिए। किसी काम को अपना कैरियर बनाने से पहले एक इंटर्न की तरह कुछ वक्त काम कर लीजिए ताकि आपको यह पता लग जाए कि आपको उससे सच में लगाव है या नहीं। अगर अगली बार आपको कसरत करना हो, तो खुद को एक समय दे दीजिए कि आप सिर्फ इतने समय के लिए ही कसरत करेंगे, ताकि आप दूसरे कामों पर भी ध्यान दे सकें। यह जरूरी नहीं है कि आपके पास हमेशा सिर्फ दो ही आप्शन हो। अगर आप यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आपको पार्टी करने जाना चाहिए या नहीं, तो खुद से यह सवाल कीजिए कि आप अगर पार्टी करने नहीं जाते हैं तो और क्या क्या कर सकते हैं। शायद आप एक मूवी देख सकते हैं या फिर अगले दिन जल्दी उठने के लिए जल्दी सो सकते हैं।

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