Retrain Your Brain

Resilience की ताकत
आपने ये बात अक्सर सुनी होगी कि अब तो मेरी इतनी उम्र हो चुकी अब मैं क्या नया सीखूंगा या फिर अब तो ये आदत इतनी पुरानी हो चुकी है कि इसे बदलना बहुत मुश्किल है। ये सच है कि पुरानी चीज को तरोताजा करना मुश्किल है पर जब दिमाग की बात आती है तो ऐसा कोई नियम उस पर लागू नहीं होता क्योंकि हमारे दिमाग की एक बहुत अच्छी क्वालिटी है और वो है plasticity. इसे आसान शब्दों में बताया जाए तो ये बिल्कुल किसी clay की तरह है जिसे आप मनचाहे तरीके से ढाल सकते हैं। यानि हमारा दिमाग resilient होता है। ये क्वालिटी खास तौर पर तब और भी ज्यादा मददगार साबित हो सकती है जब आप खुद को नकारात्मक विचारों के जाल से बाहर निकालना चाहते हैं। समझते हैं कि इसे कैसे करना है।
लेखक (Seth J. Gillihan, PhD)
Seth Gillihan एक जाने माने साइंटिस्ट और लेखक हैं। वो Think Act Be नाम के पॉडकास्ट को होस्ट भी कर चुके हैं। उन्होंने Pennsylvania यूनिवर्सिटी से पीएचडी की है। वो साइकोलॉजी और माइंडफुलनेस पर बहुत सी किताबें लिख चुके हैं जिनमें Mindful Cognitive Behavioral Therapy, The CBT Deck और A Mindful Year शामिल हैं।
Plasticity की ताकत
क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपका दिमाग आपके खिलाफ काम कर रहा है? शायद आप छोटी छोटी बातों पर परेशान होने लगते हैं या फिर ना चाहते हुए भी आपके दिमाग से नेगेटिव बातें नहीं जातीं। पर इस तरह परेशान होने वालों में आप अकेले नहीं हैं। आप अपने दिमाग के इस भटकाव को ठीक करके इसे सही रास्ते पर ला सकते हैं और एक पॉजिटिव लाइफ जी सकते हैं। सेथ हमको कुछ ऐसे तरीके बताते हैं जो सिर्फ किताबी ना होकर असल जिंदगी में अपनाए जा सकते हैं। इस तरह आपको अपने दिमाग को हर जकड़न से निकालने में मदद मिलती है। ये सारे तरीके न्यूरोसाइंस और साइकोलॉजी पर आधारित हैं और आपकी मेंटल हेल्थ को मजबूत करने में बहुत मदद करते हैं। अब चाहे आप डिप्रेशन और एंजायटी से गुजर रहे हों या किसी दूसरी उलझन से ये तरीके आपके बहुत काम आते हैं।
जरा इस बात को समझिए कि resilience सबसे बड़ी ताकत है। इस वजह से हम काफी साल पुराने हो चुके दिमाग को कोई नई चीज सिखा सकते हैं। सच तो ये है कि हमारे दिमाग में खुद को बदलते रहने की बहुत अच्छी ताकत होती है। क्योंकि वो लगातार नए neural connections बनाता रहता है। उम्र या हालात जैसे भी हों ये कनेक्शन बनते मिटते रहते हैं। इस बात को और अच्छी तरह समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए आप लंदन में एक टैक्सी ड्राइवर बनना चाहते हैं। आपको इसके लिए ऐसा टेस्ट पास करना होता है जहां आपको शहर का नक्शा याद करना पड़े। इसमें पच्चीस हजार से ज्यादा सड़कें और बीस हजार से ज्यादा लैंडमार्क हैं। ये बात सुनते ही चक्कर आने लगे ना। लेकिन आप जैसे जैसे इसे याद करने लगते हैं आपका दिमाग खुद ब खुद इस तरह के न्यूरल कनेक्शन बनाता चला जाता है कि आप इसे आसानी से याद कर पाएं। अब लंदन में रोजाना हजारों की तादाद में कैब दौड़ ही रही हैं ना। एक स्टडी बताती है कि लंदन के टैक्सी ड्राइवरों का hippocampus बाकी नागरिकों से बड़ा होता है। ब्रेन का ये हिस्सा spatial memory के लिए जिम्मेदार होता है। ये वो मेमोरी है जो आपको बातें याद दिलाती है। जैसे चाबियां रखकर उनको वापस लेना। इस स्टडी का आपके लिए क्या मतलब है? इससे आपको ये पता चलता है कि आप भी अपनी आदतें और बर्ताव बदलने के लिए दिमाग की इस neuroplasticity नाम की ताकत की मदद ले सकते हैं।
अब चाहे खानपान की आदत हो, एक्सरसाइज और लाइफस्टाइल की बात हो या तनाव कम करना आप हर काम मुमकिन बना सकते हैं। लेकिन आप ये मत सोचिए कि दिमाग तो बड़ी आसानी से ढल जाता है तो इस पर हम लोड लाद दें। आप धीरे धीरे शुरुआत करें। जैसे अगर ईटिंग हैबिट की बात की जाए तो पहले अपने खाने में ज्यादा फल और सब्जियां शामिल करें। या फिर सोडा की जगह पानी, सूप या जूस लें। ये बातें पहले तो छोटी नजर आएंगी पर समय के साथ जैसे जैसे आपका दिमाग इन आदतों के हिसाब से बदलाव लाने लगेगा तो आपको भी एक बड़ा फर्क महसूस होगा। पर एक बात का और ध्यान रखना है और वो ये कि आप खुद के साथ नरमी बरतें। हालांकि बदलाव अनुशासन मांगता है पर आपको अनुशासन और सख्ती में फर्क समझकर चलना होगा। ऐसा तो नहीं हो सकता कि आप हर गोल समय से पूरा कर ही लें। अगर कोई कमी रह भी जाती है तो खुद से नाराजगी ना रखें। आखिर आप अपने ब्रेन को rewire कर रहे हैं। मान लेते हैं कि आप कोई कॉलेज स्टूडेंट हैं। आपके एग्जाम नजदीक आ रहे हैं पर आपने सिलेबस पूरा नहीं किया है। जाहिर है कि आप दबाव और चिंता महसूस करेंगे। इस हालत में आपके पास दो रास्ते हैं। या तो खुद को कोसते रहिए और तनाव बढ़ाते रहिए या फिर अपने साथ नरमी से पेश आइए कि चलो अब तक जो भी हुआ वो भूलकर आगे बढ़ा जाए। खुद को शांत करके कहिए कि स्टूडेंट्स के लिए ऐसी चुनौतियां आना बहुत आम बात है। अब मैं इतना मन लगाकर पढूंगा कि बीते सारे दिनों की भरपाई हो जाए। अपना आत्मविश्वास और प्रेरणा बढ़ाने के लिए आप खुद को अपनी पुरानी सफलता या अचीवमेंट याद दिला सकते हैं। यानि self-compassion की इस तकनीक से आप ना सिर्फ अपना तनाव कम करके मूड सही कर रहे हैं बल्कि अपने दिमाग में इस तरह के नए न्यूरल कनेक्शन बना रहे हैं जो आपको सकारात्मक दिशा की तरफ ले जाने में मदद करें।
माइंडफुलनेस की ताकत
क्या आपने कभी ब्रेकअप का दर्द महसूस किया है? या फिलहाल आप किसी मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं? शायद आप खुद को एक अंधेरी खाई की तरफ धंसता हुआ महसूस करते हों जहां आपका खुद पर से यकीन हिल गया हो। आपको पछतावा होता हो या फिर किसी तरह का frustration. ऐसे किसी हाल में खुद को संभालना और उस अंधेरे से बाहर निकालना मुश्किल जरूर है पर आपके पास माइंडफुलनेस मेडिटेशन नाम का एक ऐसा तरीका है जिसे विज्ञान भी मानता है। ये एक बहुत ही आसान लेकिन असरदार तरीका है। इसमें आपको बस वर्तमान यानि अभी इसी वक्त के पल पर ध्यान लगाना होता है। आप अपने दिमाग में चल रहे विचारों पर ध्यान देते हैं, अपने इमोशन को समझते हैं और शरीर में महसूस हो रहे sensations पर नजर डालते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए आप जजमेंटल नहीं होते और ना ही किसी तरह का resistance बनाते हैं। ऐसा करके आप अपने दिमाग को इस बात की ट्रेनिंग देते हैं कि वो रिएक्शन कम दे और रिस्पांस ज्यादा। तनाव कम करे और resilience ज्यादा। वो अतीत की उलझनों से बाहर निकले और आने वाले कल की तैयारी करे।
चलिए मान लेते हैं कि हाल ही में आपका ब्रेकअप हुआ है। आप हर तरह का नेगेटिव इमोशन महसूस कर रहे हैं। दुख, गुस्सा, पछतावा, उदासी, नाराजगी और भी बहुत कुछ। पर अब सोचिए कि बजाए इन विचारों और भावनाओं में डूबे रहने के आपने तय किया कि आप माइंडफुलनेस मेडिटेशन करेंगे। सबसे पहले एक शांत जगह ढूंढकर बैठ जाइए। आप लेट भी सकते हैं। अब अपनी सांसों पर ध्यान लगाइए। अपनी सांसों को बदलने या विचारों को दबाने की कोशिश मत कीजिए। इनको बस बिना किसी जजमेंट के ऑब्जर्व करना है। आपके नजरिए में गुस्सा या चिड़चिड़ापन नहीं पर हमदर्दी जरूर होनी चाहिए। यानि जो हो गया वो हो गया। आपकी कोई गल्ती नहीं है। जैसे जैसे आप मेडिटेशन करते जाएंगे तो आपको एहसास होता है कि आपका दिमाग पुरानी यादों, तरह तरह की चिंताओं और कहानियों में भटकने लगता है। आपको भी इनमें बड़े आराम से बढ़ते जाने का मन होगा। कोई बुरा ख्याल आएगा तो आप खुद पर गुस्सा करेंगे। कोई गल्ती याद आएगी तो आप खुद से नाराज होंगे। लेकिन ये सब आपके मेडिटेशन और अभ्यास का हिस्सा हैं। आहिस्ता आहिस्ता करके अपना ध्यान वापस अपनी सांसों पर ले आएं।
खुद को नरमी से देखें ना कि सख्ती से। ध्यान भटकना बहुत आम बात है और इसके लिए खुद को कटघरे में लाने की कोई जरूरत नहीं है। आप शायद सोच रहे होंगे कि इस मेडिटेशन की बात सुनने में तो बड़ी अच्छी लगती है पर क्या सच में इसका असर होता है? तो जवाब है कि बिल्कुल होता है। माइंडफुलनेस मेडिटेशन आपके शरीर और दिमाग को बहुत फायदा पहुंचाता है और रोजाना इस बात का सपोर्ट करने वाली रिसर्च बढ़ती ही जा रही हैं। एक स्टडी से पता चला कि माइंडफुलनेस मेडिटेशन करने वाले लोगों में आठ हफ्तों के अंदर ही डिप्रेशन, एंजायटी और तनाव आधा रह गया था। एक और स्टडी से ये पता चला कि माइंडफुलनेस का वही असर होता है जो डिप्रेशन और एंजायटी की दवाएं करती हैं। ये असर सिर्फ उन पर ही नहीं होता जो किसी मुश्किल या उलझन से गुजर रहे हैं। माइंडफुलनेस मेडिटेशन सब पर असर करता है। फिर चाहे आप दिल की तकलीफ से गुजर रहे हों या फिर शरीर की। आपको काम का तनाव हो या अपनी निजी जिंदगी का। तो माइंडफुलनेस मेडिटेशन की शुरुआत कैसे की जाए? अब यहां सबसे बढ़िया बात ये है कि आपको कोई तैयारी नहीं करनी है। अगर आज से पहले आपने कोई मेडिटेशन ना भी किया हो तो भी फर्क नहीं पड़ेगा। रोज कुछ मिनट से शुरू करते हुए बढ़ाते जाइए। आपका ध्यान भटकता है तो भटकने दीजिए। जरूरी ये है कि आप इसे बार बार केंद्रित करते जाएं। चाहे आपको अनगिनत बार अपनी सांसों पर ध्यान वापस क्यों ना लाना पड़े। आप Headspace या Calm जैसे एप की मदद भी ले सकते हैं।

नकारात्मक विचारों पर सवाल करें
ऐसा कितनी बार होता है ना कि आप परेशान हों और एकदम से सबसे बुरे नतीजे की कल्पना करने लग जाएं। जैसे आपका कोई टार्गेट पूरा नहीं हुआ। बॉस ने आपको बुलाया और आपको लगे कि आज तो नौकरी का आखिरी दिन है। या आप किसी के साथ कॉफी पीना चाहते हों पर ये सोचकर ना पूछ पा रहे हों कि उसने तो मना ही कर देना है फिर पूछकर क्या फायदा? हमारे दिमाग में ऐसा negative thought पैटर्न बन जाता है। ये cognitive distortions की तरफ इशारा करते हैं। इसे दूर करने के लिए cognitive behavioral therapy यानि CBT की मदद ली जा सकती है। ये एक तरह की थेरेपी है जो आपके इन negative thought patterns को पहचानती भी है और बदल भी देती है। इस तरह आप अपने अंदर सकारात्मक सोच और बर्ताव के लिए जगह बना पाते हैं।
सबसे पहले ये पता लगाना होता है कि आप में किस तरह के cognitive distortions ज्यादा हैं। जैसे all-or-nothing thinking जहां आप सफेद और काले के सिवा कुछ और नहीं सोच पाते। यानि आपके पास बस दो extreme सिरे होते हैं और बीच का कोई रास्ता नहीं। दूसरे को catastrophizing कहा जाता है जहां आपको बर्बादी के सिवा कुछ और नहीं सूझता। आप सोचते हैं कि ये तो होकर रहेगा। एक बार जब आपको अपने cognitive distortions समझ आ जाते हैं तब उनको पकड़ने का नंबर आता है। जैसे अगर आपको किसी इंटरव्यू में फेल होने का डर है तो खुद से सवाल कीजिए कि इस बात का क्या सबूत है कि मैं इंटरव्यू खराब करूंगा ही। अभी तो मैं वहां पहुंचा भी नहीं हूं। आपको समझ आएगा कि ऐसी बुरी सोच को सपोर्ट करने के लिए आपके पास तो कोई वजह ही नहीं है। आप शायद ये भी देख पाएं कि उस नौकरी के लिए आपके पास पूरी क्वालिफिकेशन है। CBT का एक और जरूरी कदम होता है behavioral activation जिसमें आप ऐसे कामों की frequency धीरे धीरे बढ़ाने लगते हैं जिनको करते हुए आपको खुशी मिलती हो। अगर आप डिप्रेशन या उदासी से गुजर रहे हों तो ये तरीका और ज्यादा फायदा करता है। जैसे आपको साइकिलिंग पसंद थी पर आपने डिप्रेशन की वजह से इसे बंद कर दिया। तो अब आप किसी नजदीकी पार्क में थोड़ी देर साइकिल चलाकर वापसी कर सकते हैं। जैसे जैसे मन लगता जाए और दूर निकलते जाइए।
अपनी जिंदगी में CBT लागू करने के लिए आप आज से ही कमर कस लीजिए। अपने विचारों का रिकॉर्ड रखना इसके लिए सबसे आसान तरीका है। जब कभी आपके मन में बुरे विचार आएं तो इनको कागज पर लिख लीजिए। अब खुद से पूछिए कि आखिर इनके साथ कोई मजबूत बुनियाद भी है या ये बस आपका डर है। अब जब आप ये समझ जाएं कि बादल सिर्फ गरजने वाले हैं बरसने वाले नहीं तो उड़ान के लिए तैयार हो जाइए क्योंकि अब आपको कोई नहीं रोक सकता। अगले कदम पर उन कामों की लिस्ट बनाइए जो आपको अच्छे लगते हैं या जो आप कब से करना चाहते थे। इनके लिए समय निकालिए। हो सकता है अभी भी आपके मन में इनके लिए आनाकानी हो पर एक बार खुद को पुश करिए। जब आप बदलाव देखेंगे तो खुद ब खुद इनको करने का जोश आने लगेगा। नकारात्मक विचारों के पैटर्न को तोड़ने के लिए CBT एक बहुत मजबूत तकनीक है। ये आपको एक खुशहाल, पॉजिटिव और fulfilled जिंदगी जीने में मदद करती है।
Body-Brain कनेक्शन
आपने महसूस किया होगा की एक्सरसाइज के बाद आपका मूड अच्छा हो जाता है। या फिर नींद पूरी ना हो तो दिन भर चिड़चिड़ाहट रहता है। यानि आपके शरीर और दिमाग की सेहत आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। तो क्यों ना सही खानपान, एक्सरसाइज और नींद जैसी साधारण चीजों की मदद से अपनी मेंटल वेलनेस पर काम किया जाए। हेल्दी फूड और फिजिकल एक्टिविटी की इतनी सिफारिश किए जाने की भी वजह है। स्टडीज बताती हैं कि प्रोसेस्ड और ज्यादा चीनी वाला खाना डिप्रेशन और एंजायटी का खतरा बढ़ा देता है। जबकि फल, सब्जियां और प्रोटीन वाला भोजन इन खतरों को कम करता है। एक्सरसाइज भी इनका रिस्क कम करती है। इसकी वजह वो endorphins और brain-derived neurotrophic factor नाम के प्रोटीन हैं जो एक्सरसाइज के दौरान ब्रेन से रिलीज होते हैं। इनसे मूड बेहतर होने में मदद मिलती है। आप बहुत आसानी से अपने रूटीन में ये बदलाव कर सकते हैं। अपने भोजन में अनप्रोसेस्ड चीजें और साबुत अनाज शामिल करिए। चिप्स और कुकीज की जगह सलाद उठाइए। कुछ मीठा खाने को दिल ललचाए तो पेस्ट्री और मिठाई के बदले ताजे फल चुनिए। एक्सरसाइज भी ना भूलें। थोड़ी देर की वॉक भी मूड और एनर्जी पर बहुत असर डाल देती है। अब बारी आती है नींद की। ये बात तो हम सब जानते हैं कि अच्छी नींद लेने से आपकी सेहत भी अच्छी रहती है। रिसर्च बताती है कि नींद की कमी से डिप्रेशन और एंजायटी का खतरा बढ़ जाता है। इतना ही नहीं बल्कि इसकी वजह से cognitive फंक्शन भी बिगड़ जाते हैं। जबकि अच्छी नींद आपमें किसी तरह के तनाव को हैंडल करने और इमोशन को स्टेबल रखने में मदद करती है। अगर आप भी अच्छी नींद लेना चाहते हैं तो सोने और जागने का समय तय कर लें। चाहे छुट्टी का दिन भी हो तो भी ये रूटीन ना बिगाड़ें। सोने के कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन देखना बंद कर दें। फिर वो चाहे मोबाइल हो, कंप्यूटर या टीवी। सोने से पले खुद को रिलैक्स करने के लिए शावर लेना या किताब पढ़ना भी अच्छा आइडिया है। आपके आसपास का माहौल भी शांत होना चाहिए। ठंडा और हवादार कमरा, साफ सुथरा बिस्तर और तकिया और हल्का सा म्यूजिक आपको लेटते ही सपनों की दुनिया में ले जाने को तैयार रहते हैं। अगर आप नींद ना आने की बीमारी से ही गुजर रहे हों तो deep breathing या progressive muscle relaxation भी ट्राई कर सकते हैं। माइंडफुलनेस मेडिटेशन भी किया जा सकता है। ये छोटे छोटे से बदलाव आगे चलकर बहुत बड़ा असर दिखाते हैं। एक वक्त आएगा जब आपका शरीर और आपका दिमाग बिल्कुल चुस्त दुरुस्त हो जाएंगे।

रिश्तों की ताकत
ऐसी बहुत सी स्टडीज हैं जो ये बताती हैं कि सोशल कनेक्शन हमारी वेल बीइंग को बहुत प्रभावित करते हैं। जैसे Journal of Health and Social Behavior में छपी एक स्टडी बताती है कि जिन लोगों का सपोर्ट सिस्टम और नेटवर्क मजबूत होता है वो तनाव को भी अच्छी तरह हैंडल कर लेते हैं और डिप्रेशन और एंजायटी का मुकाबला भी बेहतर ढंग से कर पाते हैं। अब देखिए कि आप ये सपोर्ट सिस्टम कैसे बनाएं। सबसे पहले तो आमने सामने की बातचीत को महत्व दीजिए। भले ही अब चीजें डिजिटल और वर्चुअल में बदल रही हैं पर रिश्तों के लिए जितना हो सके उतना पर्सनल अप्रोच ही रखें। डिजिटल कम्युनिकेशन अपना महत्व रखता है पर एक दूसरे को सामने देखना, हाथ पकड़ना या गले लगना जैसी बातों का कोई मुकाबला नहीं है। लेकिन मुलाकात के दौरान सामने वाले को पूरी अटेंशन दें। अपना फोन अलग रखें और आंखों में आंखे डालकर बात करें। उनकी बात पूरे ध्यान से सुनें और अपनी बात भी साफ तरीके से रखें। अगर आप किसी शहर में नए आए हैं और ज्यादा लोगों को नहीं जानते तो कोई ग्रुप या क्लब जॉइन कर सकते हैं। ये कोई स्पोर्ट्स क्लब हो सकता है, बुक रीडिंग क्लब या फिर एनजीओ भी। इस तरह आप सोशल कनेक्शन बना सकते हैं। अपनी जिंदगी में मौजूद लोगों के लिए शुक्रगुजार रहें। इस तरह उनके साथ आपके कनेक्शन भी मजबूत होते हैं और कुछ अच्छा करने की खुशी आपके दिमाग को भी आराम पहुंचाती है। थैंक्यू या फिर तारीफ के कुछ शब्द होते तो बहुत छोटे हैं पर इनका असर बहुत मजबूत होता है। इसलिए इनका भरपूर इस्तेमाल कीजिए।