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अपनी सोच को स्मार्ट कैसे बनाएं?
2015 में आयी माइंडवेयर नाम की ये किताब हमें, रोज-मर्रा के जीवन में आने वाले विचारों के अर्थ को समझाती है। ये किताब बताती है कि क्यूँ हम कभी- कभी मूर्खतापूर्ण फैसले ले लेते हैं। साथ हीं साथ ये हमें स्टेटिसटीशियन (statisticians), तर्कशास्त्री (logicians) और दार्शनिकों (philosophers) द्वारा दिए गए सिद्धांतों की मदद से सही निर्णय लेना सिखाती है।
लेखक Richard E। Nisbett
रिचर्ड ई। निस्बेट दुनिया के सम्मानित मनोवैज्ञानिकों में से एक है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए वो अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन द्वारा विशिष्ट मनोवैज्ञानिक अवार्ड प्राप्त कर चुके हैं। इसके साथ-साथ उन्हें कई अन्य राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है।
दो चीज़ों के संबंधित होने का मतलब ये नहीं कि वो दोनों एक दुसरे से उत्पन्न हुयी है।
आपने कभी अपने किसी दोस्त को बहुत हीं बेवकूफी भरा काम करते देखा है? ऐसा काम जिसने आपको हैरान कर दिया हो कि, “एक स्मार्ट इंसान इतना बेवकूफ़ कैसे हो सकता है? दरअसल, हम सब जीवन में बहुत बार बेवकूफी भरे फैसले करते हैं। क्यूंकि ये हमारी टेन्डेन्सी है, हम सब अक्सर जीवन में छोटी-छोटी प्रैक्टिकल गलतियाँ करते हैं।
इस समरी को पढ कर आपकी सोच में संवेदनशीलता आएगी और आप जीवन में आमतौर पर हो जाने वाली गलतियों से बच सकेंगे। आप ये भी जानेंगे कि क्यूँ लोगों की सुनी सुनाई बातों, समाचार पत्रों या टीवी चैनल्स की बातों पर सीधे-सीधे यकीन नहीं करना चाहिए? और, कैसे आप अपने स्तर पर जानकारियाँ एकत्रित कर किसी भी विषय का एक निष्पक्ष चित्रण कर सकते हैं?
आपने सुना होगा कि एक से अधिक औसत आई-क्यू (I।Q।) वाले देश के पास अधिक औसत संपत्ति भी होती है। ये बात सच तो है, लेकिन ऐसा जरुरी नहीं कि कोई देश स्मार्ट होने के नाते अमीर भी बन जाए।
जब भी कोई दो बातें एक साथ होती हैं, तो ये मान लेना बहुत ही आसान होता है कि एक के कारण दूसरे की उत्पत्ति हुई है। खासतौर पर जब वो किसी ऐसी चीज़ की पुष्टि करती हो जो हमारी पहले से बनी धारणाओं के अनुकूल हो। इससे पहले कि हम आगे बढें कुछ बेसिक स्टैटिकल परिभाषाओं को जान लेते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर A और B दोनों घटनाएं एक साथ एक समय में होती हैं तो दोनों एक दुसरे से पॉजिटिव कोरीलेशन (Correlation) में हैं। वहीं, अगर A केवल तभी होती है जब B ना हो या B तभी होता है जब A ना हो, तो वो दोनों नेगेटिव कोरीलेशन (Correlation) में हैं।
ये जान लेना बहुत जरुरी हैं क्यूंकि हम अक्सर ये सोचने लगते हैं, चूँकि A और B सम्बंधित है इसका मतलब या तो A से B की उत्पत्ति हुई है या B से A की। जैसे कि हम उदाहरण के तौर पर एक वैज्ञानिक शोध से सिद्ध बात को ही ले लेते हैं जिसमें देखा गया है कि जो लोग चर्च जाते हैं उन लोगों की औसत आयु उन लोगों से ज्यादा होती जो कि नहीं जाते।
इन बातों को सुन कर आप आसानी से ये मान लेंगे की इश्वर में आस्था रखने से आयु बढ़ जाती है। जबकि असल में ऐसा नहीं है। चूँकि, चर्च जाना और अधिक आयु का होना दोनों बातें एक साथ देखी गई है, इसलिए हमारे दिमाग में चित्रण कर लिया कि चर्च जाने से आयु बढती है।
दो सम्बंधित घटनाओं को एक दुसरे का कारण मानने से कई बार हमसे बहुत बड़ी गलती भी हो सकती हैं। जैसे, कि 1950 के दशक में गर्मियों के मौसम में पोलियो के केस बहुत बढ़ गए साथ ही ये भी देखा गया की उन दिनों आइसक्रीम का उपयोग भी बढ़ गया। तो क्या आइसक्रीम की बिक्री पर रोक लगा के हम पोलियो की रोकथाम कर लेंगे। नहीं, आइसक्रीम और पोलियो का कोई लेना देना हीं नहीं है। चूँकि गर्मी में स्विमिंग पूल का भी इस्तेमाल ज्यादा होता है इसलिए असल में बीमारी तो वहाँ से फैली।
अगर हम पहले वाले उदाहरण को एक अलग एंगल से देखें तो हमें समझ आएगा कि एक संपन्न देश में स्वास्थ और शिक्षा रुपी मूलभूत सेवाएं पर्याप्त होती हैं इसलिए वहाँ के लोगों का औसत आई। क्यू भी ज्यादा होता है।
दिमाग हमेशा उन सबूतों का पक्ष लेता है, जो हमारी इमेजिनेशन से मेल खाते हैं।
हर इंसान खुद को एक निष्पक्ष, बुद्धिमान और सही फैसले लेने में सक्षम व्यक्ति समझता है। वो मानता है कि उसे आसानी से बहकाया नहीं जा सकता। लेकिन, असल में ज्यादातर हमारा दिमाग फैसले लेते समय शॉर्टकट का तरीका अपनाता है और, ये बात हमारे निर्णयों को बहुत प्रभावित करती है।
केवल कुछ लक्षण देख कर कई बार हम दो चीज़ों को संबंधित मान लेते हैं, जबकि कई बार उनका एक दुसरे से कोई लेना-देना नहीं होता। हम ऐसा इसलिए करते हैं क्यूंकि हम चीज़ों और उनके लक्षणों को एक दुसरे से जुडा हुआ मानते हैं। जैसे गुप्तागों (genitals) को हम हमेशा सेक्सुअलिटी से जोड़ के देखते हैं और हथियारों को हमेशा आक्रामकता का संकेत मानते हैं।
इसलिए, एक व्यक्ति को हाथ में बंदूक देखते ही हम उसे खतरे के रूप में देखने लगेंगे, भले वो बेचारा बस एक म्यूजियम का अटेंडेंट हो जो उस बंदूक को टांगने के लिए ले जा रहा था।
ये सब मानसिक शॉर्टकट के कारण होता है जिसे रिप्रेजेंटेटिवनेस हयूरिस्टिक (representativeness heuristic) कहते हैं। रिप्रेजेंटेटिवनेस हयूरिस्टिक यानी एक ऐसी मानसिक क्रिया जिसके कारण हमारा दिमाग एक जैसी चीज़ों को एक दुसरे से जोड़ के देखने लगता है। दिमाग के इस शॉर्टकट के कारण अच्छे- अच्छे मनोवैज्ञानिक भी गुमराह हो जाते हैं,
उदाहरण के लिए मनोवैज्ञानिकों पर हुए एक शोध को ले लेते हैं। जिसके तेहत उन्हें कुछ मनगढ़ंत पेशेंट के कार्ड दिए गए। जिसमें पेशेंट की जानकारी के साथ साथ इंक-ब्लॉट टेस्ट में उनके द्वारा दी गयी प्रतिक्रिया भी लिखी हुई थी।
इन कार्ड्स के हिसाब से कुछ पेशेंट्स नें इंक ब्लॉट टेस्ट में जननांगों (genitals) को देखा, अब इस बात को सुनते ही ज्यादातर लोग ये मान लेंगे कि उन रोगियों को कोई न कोई योन समस्या होगी। ठीक ऐसा मनोवैज्ञानिकों के साथ भी हुआ वो भी ऐसा हीं अनुमान लगाने लगे। शोधकर्ताओं नें कार्ड्स में हेरा-फेरी कर कुछ ऐसी रिपोर्ट लिखी थी जो ये साफ़ दर्शाती थी कि जिन पेशेंट्स नें जननांग देखे उन्हें कोई यौन समस्या नहीं हो सकती। लेकिन, इस बात को नज़रंदाज़ करके ज्यादातर मनोवैज्ञानिकों नें उन पेशेंट्स के समूह को यौन समस्या से ही जोड़ कर देखा।
कई बार हम पहले से ही मन में दो चीज़ों के संबंध को सोच कर बैठे होते है, इसलिए तथ्यों पर भी ध्यान नहीं देते। जैसे इस उदाहरण में, जब मनोवैज्ञानिकों को ये बताया गया कि योन रोगों के होने और जननांगों के इंक ब्लॉट टेस्ट में दिखने के बीच नेगेटिव कोरीलशन है। फिर भी वो मानने को तैयार नहीं थे क्यूंकि उनके अनुसार उनका अनुभव पॉजिटिव कोरीलशन की तरफ इशारा करता है।
असल में तो उन दो घटनाओं के बीच कोई संबंध था हीं नहीं, और अगर मनोवैज्ञानिक गहराई से विचार करते तो उनका अनुभव भी यही कहता। लेकिन रिप्रेजेंटेटिवनेस हयूरिस्टिक (representativeness heuristic) के कारण उन्हें बस वही केस याद जिसमें उनका ये अनुमान सही निकला था।
अगली बात यह कि इंसान रिस्क लेने से इतना डरता है कि कई बार उससे होने वाले फायेदे को भी नज़रंदाज़ कर देता है। मान लीजिये, एक व्यक्ति आपके पास आकार एक दाव खेलने का प्रस्ताव रखता है। वो सिक्का उछाल कर कहता है कि हेड आया तो आप $120 जीते और टेल आया तो आप $100 हारे। सौदा तो बहुत अच्छा है लेकिन क्या आप मान लेंगे?
ज्यादा संभावना है कि आप दाव नहीं खेलेंगे। क्यूंकि, लोगों में कुछ खो देने का डर कुछ पा लेने की ख़ुशी से कहीं ज्यादा होता है। इकोनॉमिस्ट इसे लॉस एवरशन (loss aversion) कहते हैं। बहुत से अध्ययन ये दर्शाते हैं कि अगर नुक्सान कि जरा सी भी संभावना हो तो लोग रिस्क लेने से डरते हैं भले ही उसमें कितना भी फायदा हो। क्यूंकि, ज्यादातर लोगों के लिए नुक्सान का गम फायदे की ख़ुशी से बढ़कर होता है।
एक्साम्प्ल के लिए एक अध्ययन में ऊपर बताई सिक्के वाली डील लोगों के सामने रखी गई पर ज्यादातर पार्टिसिपेंट नें अच्छी डील होने के बावजूद भी उसमें हिस्सा लेने से मना कर दिया। वो तब तक शर्त में हिस्सा लेने के लिए नहीं माने जब तक कि जीती हुई राशी 200$ यानी हारने वाली राशी से दुगनी नहीं कर दी गयी। शायद दुगनी राशी नें उन्हें दुविधा को पार कर रिस्क लेने का साहस दिया हो।
पर केवल लॉस एवरशन (loss aversion) ही नहीं है जो कि हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है ऐसी हीं एक और चीज़ है एंडोमेंट इफ़ेक्ट (endowment effect) यानी लोग उन चीज़ों को ज्यादा कीमती समझते हैं जो उनके पास है।
इसे साबित करने के लिए एक अध्ययन किया गया जिसमें एक क्लास के आधे लोगों को एक कॉफ़ी मग दिया गया और आधों को नहीं। जिनके पास मग नहीं था उनसे पुछा गया कि वो मग को कितने में खरीदेंगे और जिनके पास था उनसे पुछा गया कि वो उसे कितने में बेचेंगे।
इसके परिणाम जान के आप हैरान हो जायेंगे कि जिनके पास मग था उनके हिसाब से उसकी कीमत जिनके पास नहीं था उनके द्वारा बताई गयी कीमतों से दुगनी थी।
इस बात से हम समझ सकते हैं कि कैसे किसी चीज़ के हमारे पास होने से उसकी कीमत हमारी नज़रों में बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि हमारे निर्णय लेने का तरीका सही नहीं है। अब आगे के अध्यायों में हम जानेंगे के कि आप अपने निर्णय लेने कि क्षमता को कैसे सुधार सकते हैं।

प्रोफेशनल्स खुद को एक ऐसी टेरिटरी को समर्पित कर देते हैं, जहाँ वो मेहनत कर अपने गोल को हासिल कर सकते हैं।
चाहे कोई सुपर हिट गाना लिखना हो या एक अवार्ड विनिंग फिल्म डायरेक्ट करना हो हम सबकी एक अलग इंस्पिरेशन है और अपना अलग गोल। अपने गोल को पाने के लिए प्रोफेशनल्स जिस जगह पर मेहनत करते हैं उसे उनकी टेरिटरी कहते हैं।
जैसे मशहूर एक्टर ऋतिक रोशन की टेरिटरी हैं उनका जिम, कोरियोग्राफर गणेश आचार्य की टेरिटरी है उनका डांस फ्लोर और क्रिकेटर विरत कोहली की टेरिटरी है उनका क्रिकेट ग्राउंड। इसी तरह आपकी भी कोई न कोई टेरिटरी होगी। कैसे पता लगायें कि आपकी टेरिटरी क्या है?
सबसे पहले तो आपकी टेरिटरी वो जगह है जहाँ मेहनत कर के आप अपनी रोजीरोटी चला सकें। जहाँ काम करके आप सैटिसफाईड और चैलेंजड दोनों महसूस करें। जहाँ टाइम बिता कर के आप खुद को बेहतर बना सकें। जैसे मेरी कॉम का कहना हैं कि जब वो बॉक्सिंग रिंग से बाहर निकलती हैं तो वो खुद को एक बेहतर इंसान के रूप में महसूस करती है यानी वो बॉक्सिंग रिंग हीं उनकी टेरिटरी है।
दूसरी बात ये हैं कि आप अपनी टेरिटरी पर सिर्फ और सिर्फ मेहनत करके ही दावा कर सकते हैं। जैसे यूँ तो कई लोग मुंबई के उस क्रिकेट ग्राउंड पर क्रिकेट खेलते थे पर सचिन तेंदुलकर नें वहाँ कड़ी मेहनत कर उसपर अपना हक़ जमा लिया।
तीसरी बात ये कि आपकी टेरिटरी एक कभी न ख़त्म होने वाले रिसोर्स की तरह है, जहाँ आप जितना मेहनत करोगे बदले में उतना हीं पाओगे। जैसे ऋतिक रोशन और सचिन तेंदुलकर की तरह लेखक गुलज़ार की टेरिटरी दिखती नहीं है, क्यूंकि उनकी टेरिटरी है गानों की दुनिया। उन्होंने बॉलीवुड के लिए सैंकड़ों गाने लिखे है, जिनके बिना हम हिंदी फिल्मों को इमेजिन भी नहीं कर सकते। गुलज़ार साहब का कहना है कि जैसे-जैसे वो लिखते जाते हैं वैसे-वैसे उनकी क्रिएटिविटी और बढती जाती है।
इन महान प्रोफेशनल्स की तरह आप भी हार्ड वर्क और डेडिकेशन से अपनी टेरिटरी क्लेम कर उसे मनचाहा आकार दे सकते हैं।
जो प्रोफेशनल्स सच्चे मन से अपनी टेरिटरी में काम करते हैं वो कभी कभी कुछ ऐसा कर जाते हैं कि उस क्षेत्र का पूरा नक्शा हीं बदल जाता है। जैसे बिल गेट्स और स्टीव जॉब्स नें पर्सनल कंप्यूटर को एक कॉम्प्लीकेटेड और कॉस्टली मशीन की जगह आज एक आसान और अफोर्डेबल चीज़ में बदल दिया।
चाहे आपका गोल क्रिएटिव हो जैसे कोई फेमस पेंटिंग बनाना या नॉवेल लिखना या फिर बिज़नस ओरिएंटेड हो जैसे किसी स्टार्टअप को सक्सेसफुल बनाना, हर केस में आपको कुछ न कुछ नेगेटिव फोर्सेज का सामना पड़ेगा जो आपको अपने रास्ते से भटका सकते हैं। अपने गोल को पाने के लिए आपको इन फोर्सेज को हराना पड़ेगा और आप ये कर सकते हैं। सबसे पहले इन फोर्सेज को पहचानें और फिर अपने हार्ड वर्क और जिद्द से इन्हें हरा दें।
अगर आपको डर लग रहा है तो मतलब आप सही दिशा में जा रहे हैं।
एक नया क्रिएटिव प्रोजेक्ट स्टार्ट करते समय बहुत से लोगों को डर लगता है और इस डर के कारण वो उस प्रोजेक्ट को छोड़ देते हैं। लेकिन डर एक नेगेटिव नहीं बल्कि पॉजिटिव साईन है क्यूंकि हमें डर उन्ही चीज़ों को खोने से लगता है जिन्हें हम प्यार करते हैं। तो अगर आप इस प्रोजेक्ट को लेने से डर रहे हैं यानी आपको ये काम पसंद है इसलिए डर को नेगेटिव तरीके से देखना बंद कीजिये, खुद को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते रहिए और आप अपनी मंजिल तक पहुँच जायेंगे।
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