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THE DISTRACTED MIND

The Distracted Mind

THE DISTRACTED MIND
THE DISTRACTED MIND

टेक्नोलॉजी की दुनिया में हमारा दिमाग।

द डिस्टैक्टेड माइंड (The Distracted Mind) हमें बताती है कि आज के वक्त में हम क्यों अपने ध्यान को भटकने से नहीं रोक पाते। यह किताब हमें उन वैज्ञानिक वजहों के बारे में बताती है जिनकी वजह से हम खुद को अपना फोन इस्तेमाल करने से नहीं रोक पाते। इस किताब में हम अपने दिमाग की प्रकृति को समझ कर उसे पहले से बेहतर बनाने की कोशिश कर सकते हैं।

लेखक

Adam Gazzaley and Larry D. Rosen

एडम गैज़ेली (Adam Gazzaley) अमेरिका के एक न्युरोसाइंटिस्ट, लेखक। फोटोग्राफर और आन्त्यप्रीन्योर हैं वेशन्युरोस्केप के फाउंडर हैं और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और सैन फ्रासिस्को में न्युरोलाजी, फिलासफी और साइकाइट्री के प्रोफेसर हैं।लरी डी रोज़ेन (Larry D. Rosen) कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में साइकोलाजी के प्रोफेसर हैं। वे टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने की, एक साथ कई काम करने की, बच्चों की देखभाल करने की और जनरेशन डिफरेंस की साइकोलाजी पर रीसर्च करते हैं। उन्होंने इस पर बहुत सी किताबें लिखीं हैं।

हमारा स्वभाव किस तरह से हमें मोबाइल इस्तेमाल करने पर मजबूर करता है।

आज के वक्त में हमारा ध्यान मोबाइल की वजह से इतना ज्यादा भटकने लगा है कि हम अपने काम पर ध्यान नहीं लगा पाते। हम हर घंटे अपने मोबाइल को ना जाने कितनी बार देखते हैं। लोग चलते वक्त या गाड़ी चलाते वक्त भी खुद को अपने फोन को इस्तेमाल करने से नहीं रोक पाते हैं जिसे हर साल ना जाने कितने एक्सिडेंट हो रहे हैं।

अगर आप भी उन लोगों में से एक हैं जो अपनी इस आदत से परेशान हैं तो यह किताब आपके लिए है। यह किताब हमें बताती है कि क्यों हम खुद को अपना फोन इस्तेमाल करने से नहीं रोक पाते। साथ ही यह किताब हमें बताती है कि किन आसान से तरीकों का इस्तेमाल कर के हम अपनी इस आदत को सुधार सकते हैं और एक सुरक्षित जिन्दगी जी सकते हैं।

आज के वक्त में हमारे ध्यान लगाने की क्षमता कमजोर होती जा रही है।

हमारा दिमाग दुनिया के सभी अजूबों में सबसे बड़ा अजूबा है। जरा सोचिए हम इस दिमाग की मदद से क्या क्या कर सकते हैं? हम चाँद पर जा कर वापस आ चुके हैं, हम हजारों किलोमीटर का सफर कुछ घंटों में तय कर सकते हैं, हम चाहें तो पूरी दुनिया के हजार टुकड़े भी कर सकते हैं और यह सब करिश्मा हमारे दिमाग का है।

हमारा दिमाग हमारे शरीर का सबसे उल्झा हुआ अंग है। हम अब तक इसकी काबिलियत को पूरी तरह से समझ नहीं पाएँ हैं। हम इसकी मदद से अपने दोस्तों से बात भी करते हैं और अपने जरूरी काम भी करते हैं। इन कामों को, जो हम अपने दिमाग की मदद से करते हैं, इसे एक्ज़ेक्यूटिव फंक्शन कहा जाता है।

लेकिन एक्ज़ेक्यूटिव फंक्शन से भी ज्यादा जरूरी है काग्निटिव कंट्रोल। इसका मतलब उन कामों से है जिसमें हम अपना ध्यान लगाते हैं। एक्ज़ाम्पल के लिए जब आप किसी की बात को सुनते हैं या फिर कोई किताब पढ़ते हैं तो आप उस पर ध्यान लगाते हैं। जब आप यह फैसला करते हैं कि आपको घूमने जाना चाहिए या टीवी देखना चाहिए, जब आप सोच समझ कर कोई फैसला करते हैं, यह सारे काम आपके दिमाग के काग्निटिव कंट्रोल्स की वजह से संभव है।

अगर आपके पास काग्निटिव कंट्रोल न होता, तो आप इस किताब को पढ़ ना पाते और ना ही किसी मूवी को समझ पाते क्योंकि आप उस पर ध्यान ही नहीं लगा पाते। आप बिना किसी मकसद के बस घूमते रहते।

आज के वक्त में हमारे काग्निटिव कंट्रोल पर बहुत तनाव पड़ रहा है। इसी वजह से आप अपनी मंजिल पर ध्यान नहीं लगा पाते। इसी वजह से जब आप अपना काम करने बैठते हैं तो आपका दिमाग भटकने लगता है। हमारा दिमाग इतना उलझा हुआ है कि यह आसानी से खराब हो सकता है। हमें यह देखने को मिलता है

कि आज हम पहले से ज्यादा काम कर पा रहे हैं, यानी हमारे एक्जेक्यूटिव फंक्शन का विकास हुआ है, लेकिन हम किसी काम पर ध्यान कम लगा पाते हैं जो यह दिखाता है कि हमारे काग्निटिव कंट्रोल का विकास रुक गया है। इसलिए आप कभी कभी अपनी बाइक का स्टैंड ऊपर करना भूल जाते हैं या फिर छत पर से अपने कपड़े उतारना भूल जाते हैं।

हम खुद को पूरी तरह से काबू नहीं कर सकते।

हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि वे अपने दिमाग को काबू कर सकते हैं लेकिन कुछ चीजें हैं जिन्हें हम कभी काबू नहीं कर सकते। आपने अपने आस पास हो रही हरकतों पर अपने आप ही रिएक्ट करते हैं और हम इसे काबू नहीं कर सकते।

एक्ज़ाम्पल के लिए अगर आप रास्ते से जा रहे हैं और आप पीछे से कोई गाड़ी अचानक से हार्न देती है तो आप तुरंत रास्ते से हट जाते हैं। ठीक ऐसे ही जब आप गलती से कोई गर्म चीज़ छू देते हैं तो आप अपने हाथ को जल्दी से जल्दी पीछे खींच लेते हैं। इन कामों को करने से पहले आप सोचते नहीं हैं जो कि एक अच्छी बात है। अगर आप ऐसे हालात में सोच कर काम करते तो उतने समय में गाड़ी आपके ऊपर से चली जाती और जब सोचकर अपने हाथ को हटाते, आपका हाथ जल जाता।

लेकिन ऐसा नहीं है कि हम सारे काम बिना सोचे समझे ही करते हैं। बहुत से काम हम सोच कर भी किया करते हैं। हम इस दुनिया को अपने हिसाब से समझते हैं और उसके हिसाब से काम करते हैं। हमारे पास यह काबिलियत भी है कि रुक कर अपने आस पास के माहौल को परख सकें और उसके हिसाब से काम कर सकें। हमारे अंदर यह काबिलियत है कि हम सोच कर सबसे अच्छे एक्शन को चुन सकें।

एक्ज़ाम्पल के लिए अगर कोई छोटा बच्चा आपकी ऊँगली काट ले तो आप उसे मारेंगे नहीं। इस हालत में आपके दिमाग में सोच कर फैसला किया ना कि अपने आप। क्योंकि आपके दिमाग को पता है कि बच्चे से उसे कोई नुकसान नहीं है, इसलिए वो सोचने के लिए समय लेता है।

आज के वक्त में हम जानकारी पा कर उतने ही खुश होते हैं जितना खाने पाने पर होते हैं।

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप कुछ जरूरी काम कर रहे होते हैं लेकिन उसके बीच कभी अपने आप को मोबाइल चेक करने से रोक नहीं पाते? यह हम सभी के साथ होता है और इसके लिए आप खुद को दोष मत दीजिए, क्योंकि यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा है।

हालांकि आज के वक्त की टेक्नोलॉजी हमारा ध्यान हमारी मंजिल से हटा देती है और हमारा समय खाती है, लेकिन फिर भी यह हमारे लिए जरूरी है। जब हम कोई जरूरी काम कर रहे होते हैं और हमारे बगल के कमरे में कुछ लोग क्रिकेट देख रहे होते हैं, तो हम भी समय समय पर जा कर स्कोर का हाल लेते रहते हैं। हम खुद को डिस्टर्ब होने देते हैं क्योंकि यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा है।

पहले के वक्त में हम हमेशा खाने की खोज करते रहते थे और जब हमें खाना मिल जाता था तो हम खुश हो जाते थे। बहुत से लोग खाना मिल जाने के बाद उसे खा लेते थे और फिर से खाकने की खोज में निकल जाते थे ताकि वे उसे एक जगह इकठ्ठा कर के रख सकें और बाद में खा सकें। आज वही काम हम जानकारी के साथ भी करते हैं।

जब हम किसी तरह की जानकारी की खोज गूगल या यूट्यूब पर किया करते हैं और जब हमें वो चीज़ मिल जाती है तो हमारे दिमाग को वही सुकून मिलता है जो पहले के वक्त में हमें खाना मिलने पर होता था। बंदरों पर किए गए एक रीसर्च में यह बात सामने आई कि खाना मिलते के बाद बंदरों के दिमाग में डोपामीन नाम का हार्मोन निकलता है और वही हार्मोन हमारे दिमाग में तब निकलता है जब हमें जानकारी मिलती है। इसलिए हम खुद को टीवी देखने से या हर एक घंटे में अपना मोबाइल चेक करने से रोक नहीं पाते।

SOCIAL MEDIA
SOCIAL MEDIA

इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया आज के वक्त में हमारा ध्यान आसानी से भटका रही हैं।

आज के वक्त में जानकारी हमारी जेब में हमेशा रखी हुई होती है। आप चाहे किसी भी चीज़ के बारे में जानना चाहें, गूगल के पास वो सब कुछ है। आप जब चाहें गाने सुन सकते हैं, मूवी देख सकते हैं। अपने फोटो खींच कर दुनिया में कहीं भी उने शेयर कर सकते हैं। इस टेक्नोलॉजी के जमाने में हमारा ध्यान और तेजी से भटक रहा है।

तीन तरह की टेक्नोलॉजी हमारा ध्यान भटका रही है – इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया । इंटरनेट की मदद से हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं और अपने स्मार्टफोन में हम जब चाहें इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया के जरिए हम इंटरनेट पर अपने विचार दे सकते हैं या फिर अपने बारे में किसी से भी विचार ले सकते हैं। हम अपनी फोटो शेयर कर सकते हैं और लोगों से जुड़ सकते हैं।

आज अमेरिका के 70% लोगों के पास स्मार्टफोन है और 460 करोड़ लोग ईमेल का इस्तेमाल करते हैं। एक और व्यक्ति एक दिन में 27 बार अपने फोन इस्तेमाल करता है और कुछ लोग तो 150 बार इस्तेमाल करते हैं।

इस टेक्नोलॉजी की वजह से हम अपना ध्यान एक जगह पर ज्यादा समय तक नहीं लगा सकते। 2013 की एक स्टोरी में एक बात सामने आई कि लोग अपना ध्यान सिर्फ 3 से 5 मिनट तक एक काम पर लगा पाते हैं और उसके बाद उनका ध्यान किसी और काम पर लग जाता है। जब हम जरूरी काम नहीं कर रहे होते हैं तो भी हमारा ध्यान बहुत भटकता है। आज के वक्त रेस्टोरेंट में बैठे दो लोग एक दूसरे से बात कम करते हैं और अपना मोबाइल ज्यादा देखते हैं। वे हम तीन मिनट पर अपना फोन देखते हैं। 2012 की एक स्टोडी में यह पता लगा कि एक जवान व्यक्ति का ध्यान एक घंटे में 27 बार भटकता है और बूढ़े व्यक्ति का एक घंटे में 17 बार। यह दोनों ही बहुत ज्यादा है।

टेक्नोलॉजी आज हमारी सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही है।

बहुत से लोगों को चलते वक्त मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत होती है। 2004 में अमेरिका के 559 लोग चलते वक्त किसी चीज़ से टकरा गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। फिर 2010 में 1500 लोगों के साथ यही हुआ। ये लोग चलते वक्त अपना फोन इस्तेमाल कर रहे थे और कुछ देर के बाद अस्पताल में भर्ती मिले। लेकिन लोग इस तरह से अपनी सुरक्षा से खिलवाड़ क्यों करते हैं। इसकी चार वजह है

सबसे पहली वजह है ऊबना। जब लोग एक काम से दूसरे काम की तरफ अपना ध्यान लगाते हैं तो उनका ऊबना काफी हद तक कम हो जाता है। प्रोफेसर लीओ येकालिस ने अपने साथियों के साथ मिलकर इसे साबित किया।

उन्होंने स्टुडेंट्स के हाथ में एक घड़ी लगा दी तो स्किन पर हो रही एराउसल एक्टिविटि को जाँचती थी। इसका मतलब जब भी उन्हें अच्छा लगेगा, वो घड़ी इस चीज़ को महसूस कर लेगी। जिनके हाथ में वो घड़ी लगाई गई थी वे स्टुडेंट्स घर पर कंप्यूटर पर काम करते थे। इसके बाद यह देखा गया कि जब भी वो स्टुडेंट्स एक काम को छोड़कर किसी दूसरे काम की तरफ अपना ध्यान लगाते थे तो वो घड़ी बताने लगती थी कि उनके दिमाग में कुछ हलचल हो रही है और उन्हें अच्छा लग रहा है। उन्हें सबसे ज्यादा अच्छा तब लगता था जब वे अपने जरूरी काम से अपना ध्यान हटा कर किसी मनोरंजन के काम में ध्यान लगाते थे।

अगली वजह है बेचैनी। हम जब अपना मोबाइल नहीं देखते तो हमारे अंदर यह भावना आती है कि किसी ना किसी का ईमेल या मैसेज आया होगा और हमें देख लेना चाहिए। हमें यह डर रहता है कि कहीं हम से कुछ छूट ना जाए और इसलिए हम बार बार अपना फोन इस्तेमाल करते रहते हैं।

तीसरी वजह यह है कि आज जानकारी को हासिल करना बहुत आसान हो गया है और हम सारी जानकारी अपने फोन से कभी भी बस कुछ सेकेंड में हासिल कर सकते हैं। क्योंकि यह आसान काम है, हम इसे बार बार करते हैं। आखिरी वजह है मेटाकोग्निशन। इसका मतलब यह है कि हमें पता ही नहीं है कि हम अपने मोबाइल के गुलाम हुए जा रहे हैं। अगर हमें यह पता लग जाए कि हम अपना फोन हद से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं तो हम उसे कम इस्तेमाल करते हैं।

हम कसरत कर के अपने काग्निटिव कंट्रोल को बढ़ा सकते हैं।

जैसा कि हमने पहले भी कहा हैं कि हमारा दिमाग बहुत उलझा हुआ है। इस उलझे हुए दिमाग की एक खासियत यह भी है कि यह खुद को समय और हालात के साथ बदल सकता है। अपने दिमाग की इस खूबी का इस्तेमाल कर के आप अपने काग्निटिव कंट्रोल को पहले से बेहतर बना सकते हैं।

इसका सबसे अच्छा तरीका है कसरत करना। चाहे आप बच्चे हों या बड़े अगर आप कसरत करेंगे तो आप खुद पर अच्छे से काबू पा सकेंगे। इससे आपकी शारीरिक सेहत के साथ साथ मानसिक सेहत भी अच्छी रहेगी।

2009 की एक स्टडी में यह बात सामने आई कि जो बच्चे सेहतमंद होते हैं वे अपने ध्यान को भटकने से बहुत अच्छे से रोक सकते हैं। जब साइंटिस्ट्स ने बच्चों को वर्चुअल रिएलीटि में डाला जहाँ पर गाड़ियाँ आ जा रही थी और उनसे कहा कि वो अपना मोबाइल इस्तेमाल करते हुए या फिर गाने सुनते हुए रोड को पार करें तो यह देखा गया कि जो बच्चे सेहतमंद थे वे आसानी से रोड क्रास कर गए। वे अपने ध्यान को भटकने से रोक पा रहे थे।

इसके अलावा आप अपने ध्यान लगाने की क्षमता को बढ़ाने के लिए काग्निटिव एक्सरसाइज भी कर सकते हैं। यह वो दिमागी एक्सरसाइज होते हैं जिनसे आप अपने ध्यान लगाने की क्षमता बढ़ा सकते हैं। इस एक्सरसाइज का फायदा हर उम्र के लोगों को हो सकता है। आपको हर रोज कुछ ऐसे काम करने हैं जिनमें आपको ध्यान लगाना पड़े और पूरी कोशिश करनी है कि आपका ध्यान ना भटके।

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कुछ मोबाइल एप्स गाड़ी चालते वक्त मोबाइल इस्तेमाल ना करने में आपकी मदद करेंगे।

हमारे पास कोई ऐसी दवा तो नहीं है जिसे हम आपको पिला दें तो आप अपना फोन हिसाब से इस्तेमाल करने लगेंगे, लेकिन कुछ आसान से तरीकों को अपना कर आप अपनी इस आदत से छुटकारा पा कर सुरक्षित रह सकते हैं।

जैसा कि हम ने पहले कहा कि अगर आपको यह पता लग जाए कि आप अपना फोन हद से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं तो आप उसे कम इस्तेमाल करने लगेंगे। गाड़ी चलाते वक्त खुद को अपना फोन इस्तेमाल करने ने रोकने के लिए आप उन खबरों के बारे में पढ़िए जिनमें यह बताया गया हो कि किस तरह से एक व्यक्ति की गाड़ी चलाते वक्त फोन इस्तेमाल करने से मौत हो गई। या फिर आप उन रिपोर्ट्स को पढ़िए जो यह बताती हों कि हर साल कितने पसेंट लोगों की इस वजह से मौत हो जाती है। इससे आपके अंदर डर पैदा होगा और आप समय के साथ खुद उसे इस्तेमाल नहीं करेंगे।

इसके अलावा आप कुछ खास तरह के एप्स जैसे ड्राइवआफ या ड्राइवमोड का इस्तेमाल कर सकते हैं जो कि आपके गाड़ी चलाते वक्त अगर आन कर दिए जाएं तो वे आपके सारे काल या एसएमएस को ब्लाक कर देंगे। इसके अलावा लाइव टु टेक्स्ट नाम का ऐप आपके सारे फोन या मैसेज पर अपने आप रिप्लाइ भेज देगा कि आप इस समय व्यस्त हैं और बाद में उन से बात करेंगे।

अगर आप गाड़ी चलाते वक्त बोर हो रहे हैं तो आप कोई कैसेट बजाइए या फिर गाने सुनिए। इससे आपका ध्यान कम भटकेगा। या फिर आप अपने दोस्तों और परिवार वालों से बोल दीजिए कि आप इस समय के बीच गाड़ी चलाते हैं और किसी से बात नहीं कर पाएंगे। वे आपको फोन नहीं लगाएंगे और आपको इस तरह से कुछ खोने का डर नहीं सताएगा। साथ ही आप लाइव टु टेक्स्ट का इस्तेमाल कर के उन सभी को एक एसएमएस भेज सकते हैं कि आप इस समय बात नहीं कर सकते।

किसी से बात करते वक्त अपने फोन को अपने पास बिल्कुल मत रखिए।

यह नजारा अब आम हो गया है कि किसी रेस्टोरेंट में जब दो लोगों को आपस में बात करना चाहिए तो वे अपना फोन इस्तेमाल करने में लगे रहते हैं। इस तरह से यह मोबाइल अब हमारे रिश्तों में भी घुस गया है और उसे नुकसान पहुंचा रहा है।

2013 में यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स ने यह दिखाया कि जब दो लोगों के बीच कोई मोबाइल फोन रखा हो तो वो सामने वाले की बात को ना तो अच्छे से समझ पाते हैं और ना ही उन से अच्छे से सहानुभूति दिखा पाते हैं। भले ही वे अपना फोन इस्तेमाल ना कर रहे हों। लेकिन सिर्फ मोबाइल के मौजूद होने से वे एक दूसरे से अच्छे से घुल मिल नहीं पाते।

इससे छुटकारा पाने के लिए सबसे पहले आपको यह जानना होगा कि आप सामने वाले से बात करते वक्त अपना मोबइल इस्तेमाल करते हैं। तभी आप बात करते वक्त इसे खुद से दूर रख पाएंगे। आप अपने डिनर टेबल को टेक्नोलॉजी फ्री बना दीजिए ताकि वहाँ पर बैठ कर सबके साथ खाना खाने पर कोई भी अपना फोन ना इस्तेमाल कर पाए।

जब भी एक व्यक्ति बोर हो जाएगा तो वो अपना फोन इस्तेमाल करेगा। इसलिए यह कोशिश कीजिए कि जो व्यक्ति आप से बात कर रहा है वो बोर बिल्कुल ना हो वरना वो अपना फोन जरूर इस्तेमाल करेगा। साथ ही आप अपने सारे दोस्तों को बता दीजिए कि आप इस बीच खाली नहीं रहते हैं और किसी से बात नहीं कर सकते ताकि वे आपको उस समय फोन ना करें। इस तरह से आपको यह डर नहीं रहेगा कि आप से कुछ छूट रहा है।

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आज की टेक्नोलॉजी की वजह से हम अपना ध्यान किसी भी काम में 5 मिनट से ज्यादा नहीं लगा सकते। अपने काम पर से ध्यान हटा कर के जब हम अपना ध्यान किसी मनोरंजन के काम पर लगाते हैं तो हमें अच्छा महसूस होता है जिससे हम यह काम बार बार करते रहते हैं। लेकिन अगर आप एक बार यह जान जाएं कि आप फोन का इस्तेमाल हद से ज्यादा कर रहे हैं तो आप इस पर काबू पा सकते हैं। कसरत कर के आप अपने ध्यान लगाने की क्षमता बढ़ा सकते हैं।

ध्यान कीजिए।
आपकी सेहत सिर्फ कसरत करने से ही नहीं सुधरती। रीसर्च में यह बात सामने आई कि ध्यान करने से भी आपका तनाव कम होता है और आप एक सेहतमंद जिन्दगी जी सकते हैं। अगर आपको नहीं पता कि ध्यान में क्या करना है तो आप अपने पास के किसी लोकल क्लास में जाइए या फिर इंटरनेट से जानकारी हासिल कीजिए।

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